अहो प्रियतम! आपसे बहते इस जीवन में बस नूर ही नूर है,
है शब्द में शास्त्रों का सार छिपा और बहता शास्ता का हृदय भरपूर है!
प्रेम होने की इस यात्रा पर जब चले हम सभी,
न मालूम था कि हर शब्द ही बन जाएगा राह की रोशनी!
परम के ओर की इस राह में, प्रेम और ध्यान की है परस्पर मैत्री,
लक्ष्य तो है प्रेम हो जाने का, पर मार्ग है सद्गुरु से मिलती ध्यान की विधि!
ज्यों पानी के बिन तैर पाना क्या होता है संभव कभी?
त्यों ध्यान की विधि तो हो पर बिन समर्पण के तैर पाना संभव नहीं!
आरंभ हुआ ‘वैराग्य’ से जो संसार का मिथ्या रूप दिखलाए,
पक्षियों के सम्मेलन से कुछ पक्षी ही सिमोर्घ का सत्य जानने उड़ पाये!
होपोय ने बहुत समझाया कि यह यात्रा ही है जीवन का मकसद,
पर वैराग्य के पंख बिना आरंभ कैसे होता, किसी भी पक्षी का सफ़र!
फिर उठी ‘जिज्ञासा’, सब छोड़, जानूँ अब ‘मैं कौन हूँ’?
मिरदाद की किताब से मिले इशारे कि ‘सामान्य मैं’ को छोड़ दूँ!
पर शब्दों से होती नहीं पहचान उसकी जो परम अज्ञात है,
खोजने की यात्रा पर बढ़ते कदम, जिज्ञासा से आते सद्गुरु के ही पास हैं!
तीसरे चरण में जाना ‘प्रार्थना’ का स्वरूप कुछ अनुपम,
जहाँ ‘प्रेम’ के पहले अनुभव की बूँदें करती हैं हृदय को पावन!
बस तीन ही मंत्र जो शुभ-अशुभ के जाल से छुड़ाते,
शुद्ध में रमा कर, परम के क्षेत्र से हैं संबंध बनाते..!
फिर हुआ उद्घाटन रहस्य से भरी ‘प्रवाह-अवस्था’ का,
बिना विज्ञान के समर्थन के कैसे बताएँ राज़ परम का!
जब भावनात्मक मस्तिष्क में होती है क्रांति ऐसी प्रचुर,
तब ही सार्वभौमिक हृदय से बनता है संयोजन भरपूर..!
अब था समय ‘लौटने’ के समयातीत पड़ाव को जानने का,
क्वांटम विज्ञान के गूढ़ सिद्धांतों ने इस अपूर्वता को दिया समझा!
कर्म का सिद्धांत भी जब हो जाता है उलट-पुलट,
तब भविष्य निर्माण के लिए उठते हैं वर्तमान में कदम!
अंत में होता है ‘पवित्र मिलन’ में भस्म होने की पूर्णता का आरंभ,
जो जलता है वह स्वयं नहीं पर अहं का है आत्यंतिक अंत!
है यहाँ अपूर्व आनंद का अनहद बहता एहसास,
जिसमें होता है चेतना के उच्चतम आयाम तक विकास!
लौट आता है जीवन अपने गर्भ में वापिस एक बार,
मिलती है मातृत्व की सुरक्षा और प्रियतम का बेशुमार प्यार!
‘प्रेम हो जाना’, है स्वयं के स्वरूप में लौटना जो है परिशुद्ध,
जब हो हमसफ़र कोई सद्गुरु सा, तो बढ़ाते जाना कदम अविरुद्ध!
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