
एक बार एक गाँव में एक मेला लगा था। मेले में लगी सभी आकर्षक सवारियों को देखकर बच्चे रोमांचित हो रहे थे। एक झूले पर सवार कुछ बच्चे खुशी से चिल्ला रहे थे। कुछ पलों के लिए धरती से इतना ऊपर जाकर फिर नीचे आने में उन्हें खूब मज़ा आ रहा था।
लेकिन वहीं नीचे एक बच्चा मायूस बैठा था, क्योंकि उसके पास किसी भी झूले में बैठने के पैसे नहीं थे। बच्चे की आँखों में आँसू देख उसकी माँ ने उससे धीरे से पूछा – “क्यों मायूस है मेरा बच्चा?”
बच्चा बोला – “माँ! मुझे भी आसमान छूना है!”
माँ मुस्कुराते हुए बोली – “बस, इतनी सी बात? चलो मेरे साथ!”
बच्चा माँ की उंगली पकड़ निकल पड़ा, और माँ उसे मेले से दूर गाँव के सबसे ऊँचे पर्वत के शिखर पर ले गई। प्यार से संभाल के उसे अपनी गोद में बिठाया, और बच्चा शांत और अनंत आसमान की समीपता को पाकर बहुत खुश हो गया।
यह संसार भी एक मेले जैसा नहीं है क्या, जिसकी सभी सुख-सुविधाएँ बनावटी झूलों जैसी हैं? जो आसमान का वादा तो करती हैं, लेकिन तुरंत नीचे गिराने के निश्चय के साथ!
पर इसी मेले में एक दूसरा विकल्प भी मिलता है – बालक सा मन लेकर किसी सदगुरु का हाथ थाम कर, संसार से दूर किसी सम्यक साधना के शिखर पर चढ़ना और फिर गुरु कृपा में बैठकर स्थिर, शांत आकाश का अनुभव करना…
झूलों से यदि मन भर गया हो, तो अब माँ की उंगली पकड़ कर अनंत आकाश छूने चलें?
Conversation