आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का एक निश्चित परिणाम है – अपने आंतरिक शैतान का बार-बार सामना करना। उसका एकमात्र उद्देश्य है आपको पुरानी आदतों और संस्कारों में ले जाना, और उसके बाद आने वाले अपराध बोध, लज्जा और आत्म-संदेह के चक्र में उलझाना।
ये शैतान आपके सामने नहीं आता। वह केवल तर्क देते हुए और संदेह पैदा करते हुए आपको यह विश्वास दिलाने का प्रयत्न करता है कि मार्ग से पतित होना इतना बुरा भी नहीं है –
“एक झूठ से किसी का कोई नुकसान नहीं होगा।”
“आज का ध्यान छोड़ो, कल दो बार कर लेना।”
“तुम एक सामान्य मनुष्य हो, कोई संत नहीं। कभी-कभी विषय-विकार के सामने झुकने में कोई बुराई नहीं।”
ऐसे मौकों पर, एक दिव्य फ़रिश्ता ही आपकी रक्षा कर सकता है – आपकी सजगता। जब आप सजग हो जाते हैं, तो ये शैतान ऐसे शक्तिहीन हो जाता है जैसे एक ज्योत के सामने अंधकार। सजगता अन्य फ़रिश्तों को भी साथ ले आती है – सत्संग का कोई महत्वपूर्ण बोध, आपकी पसंदीदा भक्ति के कुछ भावपूर्ण बोल, या बस उस एक का स्मरण मात्र, जो आपसे अनन्य प्रेम करता है (और करता रहेगा, भले ही आप कितनी ही बार गिरें)।
आप दिन में जितना समय सजग रहेंगे, आपका दिव्य फ़रिश्ता उतना ही प्रबल होता जाएगा। शैतान बार-बार अधिक से अधिक बल के साथ वापस आएगा। परंतु स्मरण रहे, घोर से घोर अंधकार भी एक अविचल ज्योत के सामने टिक नहीं सकता।
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