आती हैं राधा। “राधा कृष्ण”, न कि “कृष्ण राधा”। वृंदावन में किसी भी कृष्ण भक्त से मिलिए, यह लगभग निश्चित है कि वे “राधे राधे” ही कहेंगे, “कृष्ण कृष्ण” नहीं।
लेकिन राधा का कोई उल्लेख न तो महाभारत में मिलता है – जो एक ‘इतिहास’ है, एक ऐसा ग्रंथ जो वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन करता है – और न ही श्रीमद् भागवत पुराण में, जो कहानियों और प्रतीकों के माध्यम से प्रेम-भक्ति के शिखर को दर्शाता है। कितनी विचित्र बात है न?
इस विडंबना को समझने के लिए, यह समझना होगा कि राधा वास्तव में कौन है।
‘राधा’ कृष्ण का सबसे अंतरंग और गोपनीय रहस्य है। और रहस्य कभी शास्त्रों में नहीं मिलते। जैसा कि श्रीमद् राजचंद्रजी वचनामृत 58 में लिखते हैं – “शास्त्र में मार्ग कहा है, मर्म नहीं कहा। मर्म तो सत्पुरुष के अंतरात्मा में रहा है।”
‘राधा’ यानी कृष्ण के लिए एक गहन तड़प। और कृष्ण के आगमन से पहले इस तड़प का जगना अनिवार्य है। राधा केवल प्रियतम से प्रेम करने का नाम नहीं, बल्कि उनसे विरह की पीड़ा और उनकी प्रतीक्षा से प्रेम करने का नाम भी है। राधा यानी कृष्ण (‘प्रेम’) को पाने की सबसे पवित्र अभिलाषा।
और इसीलिए, जब तक आपके होंठ उस तड़प की मिठास से स्वयं को पवित्र नहीं कर लेते, उन्हें भी कृष्ण का नाम लेने की अनुमति नहीं है। सूफी संत इब्न अरबी इस रहस्य को जानते थे, इसलिए उन्होंने प्रार्थना की थी – “हे प्रभु! आपसे प्रेम नहीं माँगता, बस प्रेम की तीव्र प्यास माँगता हूँ।”
आपका हृदय भी अब ‘राधा’ के लिए प्रार्थना करे – कृष्ण का सबसे लोकप्रिय और सबसे गुप्त नाम। जहाँ राधा नहीं हैं, वहाँ कृष्ण आने की इच्छा भी नहीं करते। जहाँ राधा हैं, वहाँ कृष्ण आए बिना रह नहीं सकते।
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