“रचना (Creation) एक भ्रमित करने वाला शब्द है; इस दुनिया में कोई भी नई रचना नहीं होती, सब कुछ केवल अभिव्यक्त (manifest) होता है।”
– श्री अरबिंदो
मानवीय रचनात्मकता (creativity) का अर्थ कुछ नया बनाना नहीं है। यह तो अपने अनुभवों और कौशल का उपयोग करके अस्तित्व के अंशों को एक नए रूप में प्रस्तुत करने की कला है; एक ऐसा रूप जो विस्मय और प्रसन्नता जगा सके। रचनात्मकता हमें उतनी ही सहजता से उपलब्ध है जितना कि देखना या बोलना। लेकिन अन्य इंद्रियों की तरह, हम इस ‘रचनात्मक इंद्रिय’ को भी अपनी इच्छानुसार दिशा देने के लिए स्वतंत्र हैं।
इस संसार में तीन प्रकार के रचनात्मक वर्ग हैं –
विपरीत रचनाकार – ये रचना की प्रक्रिया को उल्टा कर देते हैं; अपनी आंतरिक स्थिति के माध्यम से, ये जीवन जैसे भव्य अवसर से भी दुख और पीड़ा का निर्माण करते हैं।
रचनाकार – ये बाह्य दुनिया में सुंदरता को अभिव्यक्त करते हैं – यह कोई कविता, चित्र, व्यावसायिक विचार, या प्रेम से किया गया अन्य कोई भी कार्य हो सकता है। यहाँ तक कि किसी कमरे को प्रेम से साफ करना भी एक रचनात्मक कृत्य है, क्योंकि वहाँ रहने वाले को निश्चित रूप से प्रसन्नता का अनुभव होगा।
योगी – इनकी रचनात्मकता भौतिक जगत से संबंध ही नहीं रखती। ये श्वास भी प्रेम से लेते हैं, जिससे अदृश्य चेतना को आनंद और शांति के अतीन्द्रिय अनुभव में बदल देते हैं। रचना का यह सर्वोच्च कृत्य उनकी उपस्थिति को ही दूसरों के लिए आनंद का स्रोत बना देता है।
हम रातों-रात योगी नहीं बन सकते। लेकिन हर दिन कम से कम एक कार्य को प्रेम से करना एक शुभ आरंभ होगा। क्योंकि “प्रेम ही हर रचना की गुप्त सामग्री है”, यह सृजन का सर्वोत्तम सत्य है।
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