दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।
– तुलसीदास जी, रामचरितमानस
रामचरितमानस की इस चौपाई का अर्थ है – “भगवान राम का राज्य सभी प्रकार के त्रिविध तापों से मुक्त था – दैहिक (शरीर और मन के दुःख), दैविक (भाग्य, प्राकृतिक आपदाओं आदि अदृश्य शक्तियों के कारण होने वाले दुःख) और भौतिक (अन्य जीवों के कारण होने वाले दुःख)।”
यह चौपाई एक अतिशयोक्ति लग सकती है; आज की सामान्य बुद्धि तो यही कहेगी कि ऐसे राज्य का अस्तित्व केवल एक कवि की कल्पना में ही हो सकता है। हम चौपाई की ऐतिहासिक वैधता का पता नहीं लगा सकते हैं, परंतु हम निश्चित रूप से इसके आध्यात्मिक मर्म को समझने का प्रयास कर सकते हैं।
आध्यात्मिक रूप से ‘राम’ प्रतीक है ‘आंतरिक प्रकाश’ का – प्रेम और ज्ञान का आंतरिक प्रकाश। जब मनुष्य का यह आंतरिक प्रकाश उसके संस्कारों और वासनाओं पर राज करने लगता है, तो वह अपने भीतर “राम राज्य” का ही अनुभव करता है। ऐसे मनुष्य के जीवन में भी प्रतिकूल परिस्थितियाँ आ सकती हैं, परंतु वह उनके कारण दुःख का अनुभव नहीं करता। उसका आंतरिक प्रकाश संसार की क्षणभंगुर प्रकृति को प्रकट करता है, जिससे वह शांत और साक्षी भाव में ऐसी प्रतिकूलताओं का सामना कर उनसे पसार होता है।
प्रकाश की यह ज्योत हर मनुष्य में, हर जीव में विद्यमान है, लेकिन संस्कारों और वासनाओं की तेज़ हवाएँ इसे मंद कर देती हैं। सौभाग्य से, इस सृष्टि में एक विशेष ज्योत का भी अस्तित्व है – सूर्य के समान उज्ज्वल ज्योत, जो न केवल खुद जलती है, बल्कि भक्ति और समर्पण के साथ टिमटिमाने वाली अन्य ज्योतों की रक्षा करती है और उन्हें भी प्रज्वलित करती है। इसी ज्योत को भारतीय परंपरा ने ‘गुरु’ शब्द से संदर्भित किया है – वह प्रकाश जो संपूर्ण अंधकार को दूर करता है।
हम सूर्य का धन्यवाद कैसे कर सकते हैं? जो हमें जीवन देने के लिए स्वयं जल रहा है, उसके प्रति जितनी भी कृतज्ञता अभिव्यक्त करें, कम ही रहेगी।
परंतु हम समय के अंत तक सतत प्रयास तो कर ही सकते हैं?
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