एक दिन एक कपड़े की दुकान में एक युवक आया। उसकी ज़रूरत स्पष्ट थी – रिश्तेदार की शादी के लिए एक सुंदर सूट। उसे एक अच्छा सूट दिखाई दिया। सूट पहनकर वह खुश हो गया। यह सूट उस पर इतना जच रहा था कि आसपास के लोग भी उसे देखने लगे थे!
परंतु थोड़ी ही देर में उस युवक ने महसूस किया कि वह सूट उसे छोटा पड़ रहा था, उसका कपड़ा थोड़ा चुभन वाला था और वह बहुत महंगा भी था। फिर भी, सूट खरीदने के लोभ को दूर करना उसे कठिन लग रहा था। तो क्या हुआ यदि वह थोड़ा असुविधाजनक था? उस सूट में वह इतना अच्छा दिख रहा था!
वहीं पास खड़े एक वृद्ध इस युवक की दुविधा देख रहे थे, समझ रहे थे। वे उसके पास आए और बहुत प्रेम और शांति से बोले, “बेटा, क्या तुम सूट खरीदने की सोच रहे हो या सूट तुम्हें खरीदने की सोच रहा है?” युवक समझ गया और वह सूट छोड़ आगे बढ़ गया।
इस दुनिया की चकाचौंध भरी दुकान में आपका ‘पसंदीदा सूट’ कौन सा है? वह जो दूसरों से प्रशंसा और स्वीकृति आकर्षित करता है, या वह जो आपके आनंद और शांति को बढ़ाता है? वह जो आपको अच्छा “दिखाता” है, या वह जो आपके लिए वास्तव में अच्छा है?
जगत को अच्छा दिखाने के लिए अनंत बार प्रयत्न किया; फिर भी उससे अच्छा नहीं हुआ।
– श्रीमद् राजचन्द्र जी, वचनामृत 37
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