हम अक्सर लोगों को दोष-दृष्टि से देखते हैं।
“वह हमेशा काम पर देर से आता है।”
“वह बहुत ही बेरुखी से बात करती है।”
“उसके प्रत्येक कर्म में कोई न कोई स्वार्थ छिपा होता है।”
यह दोष-दृष्टि हमें उस एक्यता को नहीं देखने देती जिसने हम सभी को जोड़ के रखा है।
अध्यात्म इस दोष-दृष्टि को अनुकंपा और करुणा में रूपांतरित करने के लिए दो दृष्टिकोण प्रदान करता है –
- हर मनुष्य मात्र अपनी मान्यताओं तथा पूर्व की परिस्थितियों और कर्मों का कुल जोड़ है। इन तीनों का जोड़ ही व्यक्ति के कारण शरीर के रूप में जाना जाता है। कल्पना करें कि आप अपने कारण शरीर को किसी ऐसे व्यक्ति के साथ बदल देते हैं जिसे आप नापसंद करते हैं—आप बिल्कुल उनके जैसा व्यवहार करना शुरू कर देंगे।
- जिनके साथ आपका खून का संबंध है, उनके प्रति तो आप एक सहज जुड़ाव अनुभव करते हैं। तो क्यों न आप उन सभी के साथ भी जुड़ाव महसूस करें जो आपकी ही तरह एक ही मूल ऊर्जा से बने हैं?
तो, आप कौन सा दृष्टिकोण चुनने जा रहे हैं?
हर समय चुनाव आवश्यक नहीं होता। एक को क्यों चुनें, जब आप दोनों को अपना सकते हैं?
निम्नलिखित दो सरल कथन दिए गए हैं जो इन दोनों दृष्टिकोणों को आपके हृदय में अंकित कर देंगे –
- आप भी उनके जैसा ही करते।
- आप दोनों एक ही हो।
हम सब एक ईश्वर की संतान है। सब के प्रति हमारा दृष्टिकोण समान होना चाहिए… अपने पराये का भेद-भाव छोड़कर हमे समभाव मे ही रहना चाहिए। जय कृपालु 🙏♥️⚘️
हम सब एक ही ऊर्जा से बने हैं या एक ही हैं