बचपन में हमने सिंड्रेला की कहानी पढ़ी या सुनी होगी। वह राजकुमार से मिलने के लिए राजकुमारी का भेष ओढ़ के जाती है, लेकिन आधी रात होते ही उसका क्षणिक भेष उतरने लगता है। सिंड्रेला वहाँ से भाग जाती है, पर पीछे रह जाती है उसकी काँच की जूती। राजकुमार उसका पीछा करता है और उसे काँच की जूती के ज़रिए ढूँढ़ लेता है। उसे पता चलता है कि वह एक सामान्य लड़की है, राजकुमारी नहीं। परंतु यह जानने पर भी वह उससे प्रेम करने और उससे विवाह करने का फैसला करता है। जीवन के विभिन्न पड़ावों पर समय अनुसार हमारे जीवन में आनेवाले लोग भी कई क्षणिक भेष ओढ़ कर आते हैं, जैसे अमुक प्रकार के भाव, विचार, व्यवहार और जीवनशैली। जब समय के साथ-साथ यह भेष उतर जाता है, तो हमारे लिए असली व्यक्ति को स्वीकार करना मुश्किल हो जाता है। हम उनके प्रति, जीवन के प्रति, और यहाँ तक की ईश्वर के प्रति भी द्वेष से भर जाते हैं। क्या हम सिंड्रेला के राजकुमार से कुछ सीख सकते हैं? क्या हम उन क्षणिक काँच की जूतियों के प्रति अपनी आसक्ति को छोड़ सकते हैं? बेशक, विषैले व्यक्तियों और रिश्तों को छोड़ देने में ही बुद्धिमानी है। केवल यही तय करेगा कि हमारी कहानी दुखद होगी, या सिंड्रेला जैसी परीकथा..!
जीवन में सभी के लिए धन्यवाद से भरना, क्योंकि हर किसी को उस रूहानी दुनिया से मार्गदर्शक के रूप में भेजा गया है। सूफी संत रूमी
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