अहंकार से आत्मा तक की यात्रा के तीन चरण होते हैं —
उद्देश्य ढूँढना – इस उद्देश्य को अहंकार के अस्तित्व और सुरक्षा की चिंता से ऊपर उठना पड़ता है। अर्थात्, यह एक उच्च उद्देश्य होना चाहिए जो जाति, राष्ट्र, धर्म, लिंग आदि किसी भी अहंकार-आधारित पहचान के बिना समाज के मंगल के लिए हो।
संतोष का अनुभव – यह संतोष आनंद, प्रेम और शांति के आत्मिक गुणों के रूप में मिलता है। ये ‘आत्मा’ के गुण हैं क्योंकि इन गुणों के कोई विपरीत अवगुण नहीं हैं।
लौटाने में प्राप्त करना – जब आप अपने हाथ के किसी घाव पर दवा लगाते हैं, तो क्या ऐसा लगता है कि एक हाथ दूसरे हाथ को कुछ “दे रहा है”? नहीं, क्योंकि दोनों हाथ एक ही शरीर का हिस्सा हैं। उसी प्रकार, इस रूपांतरण के अंतिम चरण में आप सभी जीवों और वस्तुओं के अंतर-संयोजन को महसूस करते हैं। लौटाने के हर कार्य में आप अंततः प्राप्त ही करते हैं।
यदि कोई बिना किसी उच्च उद्देश्य के संतोष का अनुभव करने का प्रयास करता है, तो वह या तो संसारी है या जड़-क्रियावादी। यदि कोई बिना संतोष अनुभव किए अंतर-संयोजन और एक्यता की बातें करता है, तो वह मात्र शुष्क-ज्ञानी है। जब कोई विकास के इस क्रम का पालन करता है, तभी वह एक सच्चा साधक बनता है।
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