एक शिष्य कई वर्षों से अपनी साधना का पूर्ण अनुशासन से पालन कर रहा था। लेकिन इतने वर्षों के पश्चात् भी वह अपने गुरु द्वारा बताए गए परम लक्ष्य, ईश्वर के साथ पवित्र मिलन से ख़ुद को कोसों दूर महसूस कर रहा था।
एक सुबह, वह शिष्य अपने गुरु के पास गया और उनसे पूछा, “प्रभु, आप ईश्वर से जिस पवित्र मिलन की बात करते थकते नहीं, मैं उस मिलन से कितनी दूर हूँ?”
गुरु ने कहा, “मेरे साथ चलो।”
यह कहकर, वे शिष्य को एक तालाब के पास ले गए और उसका सिर पानी में डुबो दिया। कुछ क्षण बाद उन्होंने उसका सिर पानी से निकाला और पूछा, “कैसा लगा?”
शिष्य गहरी श्वासें लेते हुए बोला, “ऐसा लगा जैसे मैं मरने वाला हूँ!”
गुरु ने फिर पूछा, “जब तुम पानी के नीचे थे, तब तुम्हारे मन में क्या विचार चल रहे थे?”
शिष्य ने कुछ क्षण सोचा, फिर उत्तर दिया: “कोई विचार नहीं थे, बस किसी प्रकार श्वास लेने के लिए बेचैन था।”
“बिल्कुल!”, गुरु ने आँखों में चमक के साथ हर्षपूर्वक कहा। “तुम अनंत काल तक इस मार्ग पर चलते रह सकते हो, और ईश्वर से उतनी ही दूर रहोगे जितना इस ब्रह्मांड के दो छोर एक दूसरे से दूर हैं। लेकिन जिस दिन तुम ईश्वर के लिए उसी प्रकार तड़पोगे जैस पानी के नीचे श्वास लेने के लिए तड़प रहे थे, उस दिन ‘ईश्वर’ कह पाओ उससे पहले ही उसमें लीन हो जाओगे।”
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