एक वृद्ध व्यक्ति चौराहे पर खड़ा था और हर गुज़रते हुए व्यक्ति के सामने हाथ जोड़ कर विनती कर रहा था। कुछ लोग रुककर उसकी झोली में कुछ सिक्के डाल देते। परंतु सिक्के लेने के बजाय, उसने अपना थैला खोला और सबको आश्चर्य-चकित कर दिया। थैले में हीरे-मोती और रंग-बिरंगे रत्न सजे थे, और वृद्ध व्यक्ति हर किसी से निवेदन कर रहा था कि वे मुट्ठी भरकर उसकी संचित संपत्ति ले जायें। कुछ ही देर में उसके आस-पास भीड़ जमा हो गई।
जब उससे पूछा गया कि वह इतनी लापरवाही से अपनी संपत्ति क्यों लुटा रहा है, तो उसने कहा, “जहाँ भी जाता हूँ, मैं मनुष्य की उदारता देखता हूँ। हर कोई बिना सोचे-समझे अपना अथाह खजाना लुटाने को तैयार है! मैं तो बस वही करने का प्रयत्न कर रहा हूँ।”
भीड़ हंस पड़ी। “पागल हो क्या? यह तो मूर्खता लगती है, उदारता नहीं। फिर आखिर वो कौन लोग हैं जिनके पास इतना धन है?”
वृद्ध ने गंभीर मुस्कान के साथ उत्तर दिया, “प्रत्येक मनुष्य के पास अकल्पनीय धन है – तुम्हारा समय, शक्ति, गुण, हुनर। क्या तुम इतनी अनमोल संपत्ति को सिर्फ दिखावे में, वस्तुओं का परिग्रह कर दूसरों को लुभाने में, और क्षणिक प्रशंसा, सम्मान आदि के लिए नहीं गवा देते?”
इस कड़वे सत्य को सुन कर भीड़ में सन्नाटा छा गया। उनके हाथों में जो हीरे-मोती और रत्न थे, वे अब व्यर्थ लगने लगे।
कहीं आप भी अपनी संपत्ति लुटा तो नहीं रहे?
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