समाज ने हमें आर्थिक सुरक्षा खोजने के लिए अभ्यस्त कर दिया है। लेकिन हममें से कितने लोग अपनी ‘ऊर्जा सुरक्षा’ के विषय में सोचते हैं?
आर्थिक सुरक्षा के लिए हम कड़ी मेहनत करते हैं – आय का एक स्थिर स्रोत बनाते हैं, आगामी जीवन के लिए धन बचाते हैं, और विकास के लिए धन का निवेश करते हैं। पर ‘प्राणिक दरिद्रता’ में जीना हमें बिल्कुल मंज़ूर है। जब बात प्राण की आती है, अर्थात् हमारी जीवन-ऊर्जा, तो हम किसी दिहाड़ी मजदूर की तरह व्यवहार करते हैं। हम हर दिन अपनी उथली श्वासों के माध्यम से केवल न्यूनतम प्राण ही जुटा पाते हैं, और उसे भी रोज़मर्रा के आम कार्यों में लापरवाही से खर्च कर देते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि दिन भर की इस मज़दूरी के बाद हम थक के चूर हो जाते हैं!
ध्यान करना अर्थात् अपनी प्राण ऊर्जा में निवेश करना।
इसके लाभ न केवल आपके जीवन-निर्वाह को सहारा देते हैं, बल्कि आपको जीवंतता की ओर ले जाते हैं – उस आनंद, शांति और उत्साह के पुनरुत्थान की ओर, जो आपकी आंतरिक तिजोरी में सुप्त पड़े हैं।
कुछ चीजें ऐसी हैं जिन्हें केवल आर्थिक धन से खरीदा जा सकता है। लेकिन जो कुछ भी हमें वास्तव में मनुष्य कहलाने के लायक बनाता है, वो सब केवल ‘प्राण’ रूपी धन से ही अर्जित किया जा सकता है।
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