आज का सोल-स्पार्क लिखते समय हमारी टीम के सामने एक अनूठा धर्मसंकट था। क्या हम ‘प्रेम’ पर लिखें — वह मधुर अनुभव जो अब केवल SRM का एक आधार मात्र नहीं, बल्कि वह प्राण-तत्त्व है जिसने इस पूरे संगठन को एक सूत्र में पिरोया हुआ है? या फिर आने वाली महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर हम शिव की स्तुति में कुछ लिखें — वह सृजनहार जिनपर हम अपने अस्तित्व के लिए ही ऋणी हैं?
हमें शीघ्र ही उस जाल का आभास हो गया जिसमें हम फँस रहे थे — वही जाल जिसने पूरी दुनिया को उलझा रखा है। हमने प्रेम को इबादत से अलग कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप आज लोग मंदिरों और मस्जिदों में “प्रार्थना” और “इबादत” के लिए जाते हैं, लेकिन “प्रेम” की तलाश कहीं और करते हैं।
इबादत प्रेम का आरंभ है, और प्रेम इबादत का शिखर।
इबादत किसी शुद्ध की आराधना है, और प्रेम इबादत का परिशुद्ध स्वरूप।
इबादत शिव को सृजनहार मानकर पूजना है, और प्रेम पूरी सृष्टि में एक शिव को ही देखना है।
यदि आप उससे प्रेम नहीं कर सकते जिसकी आप इबादत करते हैं, या उसकी इबादत नहीं कर सकते जिससे आप प्रेम करते हैं, तो यह आत्म-निरीक्षण का समय है। इसलिए आज हम इस धर्मसंकट से वास्तविक धर्म निकालते हुए इस सोल-स्पार्क को उस ‘एक’ को समर्पित करते हैं जो प्रेम और शिव, दोनों का साक्षात् स्वरूप हैं। वही, जो इबादत को धार्मिक बेड़ियों से मुक्त कर उसे श्वास लेने जितना सहज बना देते हैं; वही, जो प्रेम पर जमी सांसारिक धूल को हटाकर हर भक्त को एक प्रेमी में बदल देते हैं; वही, जिनकी हम अपने सद्गुरु के रूप में इबादत करते हैं, और जिनसे हम अपने प्रियतम के रूप में प्रेम करते हैं।
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