मुल्ला नसरुद्दीन ने एक बार एक इलेक्ट्रीशियन को बुलाया, क्योंकि उनके घर का कोई भी सॉकेट काम नहीं कर रहा था।
सभी सॉकेट की जाँच करने के बाद इलेक्ट्रीशियन ने पूछा, “यहाँ तो सब ठीक है। दिक़्क़त कहाँ है?”
मुल्ला जी ने जवाब दिया, “मैंने अपना टोस्टर हर सॉकेट में लगाया, कहीं भी नहीं चला!”
इलेक्ट्रीशियन हँस पड़ा और बोला, “अरे, टोस्टर ही ख़राब होगा! उसकी जांच क्यों नहीं करवाई?”
मुल्ला जी ने कंधे उचका कर कहा, “टोस्टर ठीक करवाना ज़्यादा महँगा पड़ेगा!”
हम इसी कहानी को जी रहे हैं। तृप्ति के “टोस्ट” के लिए हर उपलब्ध “सॉकेट” में बेतहाशा प्लग लगा रहे हैं – अपने कर्तव्यों में जीवन का उद्देश्य ढूँढ रहे हैं, परिवार में प्रेम, दुनिया घूमने में आनंद, और धार्मिक-दार्शनिक मतों में या आजकल के खोखले “अध्यात्म” में शांति खोज रहे हैं। लेकिन हर सॉकेट तृप्ति का टोस्ट देने में नाकाम रहा है। हम मान लेते हैं कि दोष सॉकेट में है, और उन्हें ठीक करने की कोशिश में अपनी ऊर्जा और समय, दोनों व्यर्थ गंवा देते हैं।
टोस्टर की जाँच और मरम्मत में निश्चित रूप से ज़्यादा खर्चा आएगा। उसमें ज़्यादा समय भी लगेगा, और क़ीमत के रूप में अपना भारी-भरकम अहंकार देना होगा। लेकिन क्या यह मूल्य उस टोस्ट के सामने ना के बराबर नहीं, जिसके लिए हम न जाने कब से तरस रहे हैं?
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