अज्ञानी मन जब प्रेम की धारणा करता है तो उसके साथ ही साथ आसक्ति, अपेक्षा और घृणा जुड़े हुए रहते हैं। लेकिन जब ज्ञानी के हृदय में प्रेम के पुष्प खिलते हैं तब उसकी सुवास में भी किसी भी अशुभ भाव का वास नहीं होता है। ज्ञानी का प्रेम उनकी ‘पूर्ण’ हुई आंतरिक दशा से प्रकट होता है लेकिन अज्ञानी का प्रेम उसकी अतृप्ति में से जन्म लेता है इसलिए दोनों के शब्द भले एक जैसे दिखते हों लेकिन उनके गुणधर्म ही अलग हैं।
अज्ञानी प्रेम कर के कुछ पाना चाहता है परंतु ज्ञानी तो प्रेम कर के सब कुछ लुटाने को तैयार रहता है। अज्ञानी के प्रेम में प्रेम-पात्र से ख़ुद को भर लेने की मंशा है लेकिन ज्ञानी के प्रेम में जगत-मात्र को भर देने की भावना है। ज्ञानी का प्रेम उनका स्वभाव है और जब वह तुम तक बहता है तो तुम्हें भी शुभ भाव में ही प्रवृत्त करता है। लेकिन अज्ञानी का प्रेम उसका विभाव है और इसलिए उसके संपर्क में आते ही तुम में भी संसारी भावनाएँ सक्रिय होने लगती हैं।
शुद्ध प्रेम भोग की भावनाओं से मुक्त होता है क्योंकि दूसरों से तृप्त होने की सब धारणाएँ खो चुकी हैं। ऐसा प्रेम देह-भाव से ऊपर उठ जाता है और सम्यक् योग के आधार पर देहातीत दशा की ओर बढ़ता है। लेकिन अशुद्ध प्रेम में भोग की कामनाएँ मौजूद रहती हैं जिसके कारण जीव कभी भी देह भाव से ऊपर ही नहीं उठ पाते हैं।
आज, प्रेम को पाने के लिए सारा जगत उत्सुक दिखता है लेकिन प्रेम कुछ पाना नहीं, परंतु हो जाना है। और इसी हो जाने में हम देह से ऊपर उठ जाते हैं। इसी के परिणाम स्वरूप देह की सभी इच्छाओं, कामनाओं और वासनाओं से मन का संबंध टूटता है और ईश्वरीय सत्ता से प्रेम का अटूट बंधन उभर आता है!
Conversation