सद्गुरू की प्रेम समाधि यानी ऊर्जा का अतुल अस्खलित बहाव। और जब प्रेम की यह अपूर्व संपदा बहती है तो प्रश्न होता है कि इसे किसके आँचल में उड़ेल दिया जाये? सभी आँचल छोटे पड़ते हैं, सभी पात्र छोटे दिखते हैं और सभी मन के आँगन संकुचित लगते हैं। यह तो किसी शिष्य के समर्पण में प्रेम का ऐसा आकाश उघड़ कर आया होता है कि सद्गुरू की प्रेम-संपदा उसी में सहज उड़ेल दे जाती है। आकाश से भी व्यापक इस प्रेम-ऊर्जा को कोई आकाश जैसे अलिप्त हृदय का ही साथ चाहिए जो इस संपदा को सम्भाल भी सके और समय आने पर दूसरों को बाँट भी सके।
प्रेम की यह मधुर ध्वनि कानों से नहीं हृदय से सुनी जाती है। जिसके हृदय में जितना समर्पण है, भक्ति है, श्रद्धा है और प्रार्थना है वही प्रेम की इस ध्वनि को सुनता है, प्रेम की इस बरसात में भीगता है और उसी का हृदय आकाश जैसा निष्कलंक हो जाता है। यही प्रेम की अपूर्व संपदा है!
ईश्वर की संपूर्ण खोज ही प्रेम की खोज है। ईश्वर को आकार में समझाया जाए तो पत्थर की प्रतिमाएँ बन जाती हैं लेकिन ईश्वर को एहसास में समझाया जाये तो वह प्रेम हो जाता है। पत्थर की प्रतिमाओं के आसपास मंदिरों की दीवारें बन जाती है लेकिन प्रेम के इस धन्य एहसास में वह परिशुद्ध शक्ति है जो सभी दीवारों को गिरा देता है। इस प्रेम की खोज, प्रेम का एहसास और प्रेम में ख़ुदमुख़्तार (independent) हो जाना ही प्रेम की अपूर्व संपदा है!
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