जिसे भी अध्यात्म की थोड़ी बहुत समझ है वह जानता है कि “स्त्रैण” और “पौरुष” शब्द लिंग-विशिष्ट नहीं हैं। वे सार्वभौमिक शक्तियाँ हैं जो इस ब्रह्माण्ड का सृजन, संचालन और अंततः विलय करती हैं। ये सर्वव्यापी ऊर्जाएँ मनुष्यों के भीतर गुणों के रूप में भी प्रकट होती हैं।
नवरात्रि में दिव्य स्त्रैण ऊर्जा का उत्सव मनाया जाता है। लेकिन स्त्रैण ऊर्जा पर इतना ज़ोर क्यों? पौरुष ऊर्जा पर क्यों नहीं?
आध्यात्मिक खोज में पौरुष गुण माया पर विजय पाने के लिए आवश्यक हैं—जैसे साहस, विवेक, दृढ़ता, जोश, सजगता आदि। लेकिन विडंबना यह है कि माया के खिलाफ़ जीतना केवल आधा युद्ध जीतने के बराबर है। यह साधक को एक ऐसी असमंझस में ले जाता है जहाँ उसे अनुभव होता है कि बाहर का सब छूट गया, पर भीतर तो कुछ मिला नहीं? कोई भी साधक इस अवस्था में बहुत लंबे समय तक नहीं रह सकता।
ऐसे समय पर ही करुणा, प्रज्ञा, लचक, धैर्य, रचनात्मकता आदि स्त्रैण गुणों की शक्ति उपयोग में आती है। इन गुणों की शक्ति साधक को असमंझस से बाहर निकलने का वह एकमात्र मार्ग दर्शाती है जो वापस माया की ओर नहीं ले जाता। और नवरात्रि वर्ष का वह समय है जब इन गुणों को बहुत सहजता से उजागर किया जा सकता है।
इन पवित्र नौ दिनों और रात्रियों में प्रत्येक साधक के सामने दो विकल्प होते हैं —
यदि जैसे हो वैसे ही रहे, तो माया बेसब्री से प्रतीक्षा करेगी।
और यदि स्त्रैण गुणों का आह्वान कर लिया, तो देवी माँ अपने द्वार खोल देंगी।
कदम कदम पर सबके मन को जानने वाली करुणामई श्री सद्गुरु मां को अत्यन्त हृदय की गहराईयों से प्रेम पूर्ण अभिनंदन