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प्रबुद्ध जीवन हेतु बोध
श्री गुरु और SRM टीम द्वारा
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प्रबुद्ध जीवन हेतु बोध

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यह प्रश्न और उनके समाधान श्री गुरु और कुछ मुमक्षुओं के बीच लिखे emails में से लिए गए हैं। साधक के विचार से और मार्ग पर चलते हुए जो प्रश्न उठते हैं, उनका श्री गुरु ने स्पष्ट और संक्षेप में उत्तर दिया है।जहाँ समर्पण की बाती होती है वहीं समाधान का दीया जलता है। जहाँ समाधान की ज्योत जलती है वहाँ शिष्य की पात्रता प्रगाढ़ होती है। ऐसे में हर प्रश्न मार्ग का अगला कदम बनता है।
पढ़ें, विचार करें और आचरण में लाएँ।
श्री गुरु, आपके बताए मार्ग पर चलने से आंतरिक रूपांतरण भी हो रहा है और सभी के लिए अच्छी भावनाएँ भी उभर-उभर कर आती हैं। परंतु, ऐसा कितनी ही बार अनुभव किया है कि जब हम अपनी भावनाएँ, खुशी, अनुभव किसी दूसरे से साझा (share) करते हैं तो वह चले जाते हैं। तो क्या यह भावनाएँ झूठी हैं?
अच्छी भावनाएँ साझा करने से कभी भी नहीं घटती हैं अपितु वे अवश्य रूप से बढ़ती हैं। हाँ, यदि उनकी अभिव्यक्ति में कोई कामना, अहंकार या प्रदर्शन का भाव आ जाता है तो वह अवश्य घटेंगीं। इसलिए साधक को सदा अवलोकन करते हुए सावधान रहना चाहिए। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी समझनी चाहिए कि यदि वह भावनाएँ चली जाती हैं तो उसके स्थान में शांति, ठहराव, मौन आदि के आत्मिक वैभव बरसते हैं – जिसे ईश्वर का प्रसाद मानकर प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार करना चाहिए। साधना मार्ग में अनेक ऐसे मोड़ होते हैं जिसे हम अपनी सीमित बुद्धि से समझ नहीं सकते परंतु सनातन नियम सदा के लिए एक समान रहता है कि अच्छी भावनाएँ अच्छे परिणाम ही लाती हैं।
कभी-कभी तो वैराग्य के भाव खूब ऊँचे होते हैं और कभी-कभी मन संसार की तरफ मोहित होता है। ऐसे में हम कैसे निश्चय करें कि हम सही मार्ग पर हैं?
मार्ग एक ही है। भेद दृष्टि का है, भूल हमारे देखने के ढंग में है। कभी यह दृष्टि संसार में सुख देखती है तो कभी स्वयं में। यदि यह मन कभी-कभी संसार की ओर मोहित होता है तो अधिक नाराज़ होने की आवश्यकता नहीं है। जीवन का स्वभाव ही यह है कि यहाँ सभी कुछ परिवर्तनशील है, प्रत्येक भाव में उतार-चड़ाव, हानि-वृद्धि होती ही रहती है परंतु यदि आप किसी सद्गुरू के पास हृदय से आ गए हैं तो आप अनुभव करेंगें कि संसार भाव अधिक समय के लिए टिकता नहीं है। संसार की तरफ़ भागते हुए मन को रोकने के लिए ही अनंत ज्ञानियों ने ‘संयम’ का मार्ग कहा है। जब हम लक्ष्यपूर्वक कोई छोटा सा भी ‘संयम-नियम’ धारण करते हैं तो वह हमारे मन की व्यर्थ दौड़ को ठहराने की ऊर्जा का संचार करता है। जैसे – मन बार बार कुछ खाने की ओर जा रहा है और यह साधक को अच्छा नहीं लग रहा तो आवश्यकता है कि कुछ घंटों के लिए ‘अन्न त्याग’ का नियम ले। ऐसा करने से जो शक्ति का संचार होता है वह हमारी वृत्तियों को थामने में मददरूप हो जाता है। ऐसा प्रयोग प्रत्येक इंद्रिय के साथ किया जा सकता है।
क्या मनुष्य ईश्वर का अनुभव कर सकता है?
यह प्रश्न कुछ ऐसा है कि क्या अंधा मनुष्य सुंदर बगीचे के दृश्य को देख सकता है! आप यही कहेंगें कि अंधा रह कर दृश्य नहीं देखा जा सकता परंतु यदि आँखों का उपचार कर के रोशनी लौट आए तो अवश्य वह दृश्य देख सकता है। ठीक ऐसे ही, हम सभी अज्ञान से अंध हुए हैं जिसके कारण हमें स्वरूप की कोई समझ ही नहीं है। जैसे-जैसे सद्गुरू के समागम में हम जाते हैं और उनके कहे वचनों का विचार करते हैं वैसे-वैसे यह समझ उघड़ने लगती है। यह समझ का उघड़ना ही आँखों का उपचार है और जितनी आँखों की रोशनी लौट आएगी उतनी ही स्पष्टता से हम दृश्य को देखने में समर्थ हो जाएँगें। इसलिए, सद्गुरू के पास जा कर ईश्वर की चर्चा करने से अधिक आवश्यक है कि आपने आँखों का उपचार करने का उद्यम करें।
ध्यान में कभी-कभी ऐसा लगता है कि हम किसी उन्नत अनुभव तक पहुँच चुके हैं और कभी-कभी तो शारीरिक स्थिरता भी मुश्किल से बनती है और मन सतत चलित रहता है। ऐसे में हम क्या करें?
परिवर्तनशीलता संसारी जीवन का स्वभाव है। चाहे क्षेत्र ध्यान का हो या दुकान का परंतु जब तक हम सिद्ध नहीं हो जाते तब तक सभी कुछ परिवर्तन के नियम के आधीन है। साधक और दुकानदार में जो मूलभूत फर्क है वह यही है कि साधक इन परिवर्तनों का स्वीकार करता है परंतु जो साधक नहीं है वह संघर्ष करता है। संघर्ष संसार है और स्वीकार साधना है। यदि ध्यान में शरीर व मन अस्थिर है तो सर्वप्रथम अवलोकन करो कि क्या कहीं अपेक्षाओं के दायरे में कोई विशेष वृद्धि हुई है? यदि हाँ, तो उसकी व्यर्थता जान कर उससे निवृत्त हो जाओ और यदि नहीं, तो स्वयं को कुछ समय दो। साधक लगभग यह भूल करता है कि उसे लगता है कि ध्यान-क्रिया करने के बाद वह शांत हो जाएगा परंतु वस्तुतः जब वह अहोभाव पूर्वक ध्यान-क्रिया करता है तब वास्तविक शांति से उसका परिचय होता है जो जीवन में रही व्यर्थ अपेक्षाओं से उसे आजाद करने का कार्य करती है।
क्या गुरु की शरण में आए प्रत्येक मनुष्य का मोक्ष अवश्य होता है?
मोक्ष का मार्ग गुरु बताते हैं परंतु मोक्ष की व्याख्या व आवश्यकता सभी मनुष्यों की अपनी-अपनी होती है। सामान्य मनुष्य सांसारिक दुखों से छूटने के लिए सद्गुरू की शरण में आता है, समझदार व्यक्ति अपनी शंकाओं के छूटने के लिए सद्गुरू की शरण में आता है परंतु साधक जीव अपने दोषों से मुक्त होने के लिए सद्गुरू की शरण में आता है। जो मनुष्य जिसके लिए आता है उसे वही प्राप्त होता है। इसलिए, यह समझना अधिक आवश्यक है कि तुम सद्गुरू के पास क्यों आए हो क्योंकि तुम्हारे आने का कारण ही तुम्हारे कार्य में पलटता है। सद्गुरू तो मात्र माध्यम है, निमित्त है।
श्री गुरु, आपको सुनने के बाद हमारी बहुत इच्छा होती है कि हम इस मार्ग पर चलें परंतु हमारे गृहस्थी आदि के कर्म हमें आपके बताए मार्ग पर चलने नहीं देते हैं। ऐसे में हमें क्या करना चाहिए?
जिसे वास्तविक रूप से सद्गुरू के बताए हुए मार्ग पर चलने की आवश्यकता लगी है उसके लिए कर्म कभी भी दीवार नहीं बनते, अपितु द्वार बनते हैं। हाँ, यह मापदण्ड निकालना आवश्यक होता है कि वर्तमान में गृहस्थी आदि के कार्यों में से कितना समय निकाल कर सत्संग सुने जा सकते हैं। सत्संग सुनने के पश्चात् उसका विचार, चिंतन, मनन इत्यादि तो आंतरिक कार्य हैं जो बाह्य कामों को करते हुए भी किए जा सकते है। सामान्य रूप से मनुष्य दूसरों से तुलना करने लग जाते हैं कि हम भी उनकी तरह दिन में 2-3 घंटे सत्संग देखें, प्रत्यक्ष समागम में जाएँ, सेवा करें। परंतु उन सबका योग नहीं दिखने के कारण वह आरम्भिक स्तर का पुरुषार्थ भी नहीं उठाते जिससे उनको सदा ऐसा लगता है कि कर्म हमें बाधा पहुँचा रहे हैं। मेरा ऐसा मानना है कि यदि 30 मिनिट भी रोज़ कोई सत्संग देखने का नियम धारण करता है तो सम्पूर्ण कर्म-सत्ता को अपने अनुकूल बना सकता है। आवश्यकता है, दूसरों से तुलना करना छोड़ दें और स्वयं के निजी-कार्यों में से स्वयं के लिए समय निकालना शुरू करें। सम्पूर्ण ईश्वरीय-सत्ता मददरूप होती है।
क्या आपके बताए हुए मार्ग पर चलने के लिए हमें अपने धर्म-संप्रदाय की क्रियाओं, व्रत, जप, पूजा आदि को छोड़ देना होगा?
कदापि नहीं। वस्तुतः स्वरूप समझने के पश्चात् आपको उन क्रियाओं-जप-तप आदि में अधिक उल्लास का अनुभव होगा और उन्हें करते समय वास्तविक भावों का स्फूरण होगा। धर्म संप्रदाय में कही कोई भी क्रिया वास्तव में हमारे भावों को शुद्ध करने के लिए हैं और सत्संग साधक को इस प्रकार से स्वरूप की समझ देते हैं कि वह प्रत्येक क्रिया में भाव-विशुद्धि का मार्ग खोज लेते हैं। कुछ भी छोड़ना नहीं है परंतु उसमें आध्यात्मिक दृष्टिकोण को जोड़ना है जिससे हम धर्म क्षेत्र में स्वयं को छलने का कार्य ना करें। जैसे – कोई माला जप रहा है परंतु मन भूत और भविष्य काल में भटक रहा है तो यह क्रिया ना तो शुभ है, ना ही धर्म। सद्गुरू तुम्हें यही समझाते हैं कि कैसे अपने प्रत्येक कार्य की गुणवत्ता (quality) को बदला जा सकता है।
शास्त्रों में आता है कि कामना ही संसार परिभ्रमण का कारण है तो क्या मोक्ष की इच्छा रखना भी कामना है?
जो सदा के लिए अपना नहीं होता उसकी चाह रखना ‘कामना’ है परंतु जो सदा अपना ही है उसकी चाह रखना ‘भावना’ कहलाती है। जगत में दिखते वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति सदा से अपने नहीं होते और सदा काल के लिए अपने साथ नहीं रहते। ये सभी कुछ समय के लिए हमारे साथ रहते हैं और फिर बदल जाते हैं इसलिए इनसे सुख की चाह रखना कामना कहलाती है और वह अवश्य रूप से संसार परिभ्रमण का कारण बनती है। परंतु सद्गुरू के समागम में आ कर स्वयं में रूपांतरण करके स्वयं के आंतरिक वैभव को प्रकट करने की चाह को भावना कहते हैं और यह भावना भव-नाशिनी होती है।
इन प्रश्नों के समाधान पढ़ते हुए यह स्वाभाविक है कि साधक के मन में कुछ नए प्रश्नों का जन्म हो। ऐसे में हम आपको अपने प्रश्न यहाँ लिखने के लिए आमंत्रित करते हैं। आपके परमार्थ संबंधित प्रश्नों का समाधान श्री गुरु से प्राप्त हो सकता है। समाधान प्रकाश के आगामी संकलन में कुछ प्रश्नों के समाधान प्रकाशित किए जाएँगें।
ऐसे ही कुछ प्रश्नों पर विस्तार से पढ़ें "समाधान" किताब में। यहाँ पाएँ »
Bliss of Wisdom is a blog for seekers who are in search of their real self. It is published by Shrimad Rajchandra Mission Delhi – a spiritual revolutionary movement founded by Sri Guru. She is a spiritual Master who has transformed innumerable lives through her logical explanations and effective meditation techniques. To know more visit www.srmdelhi.org.
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