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प्रबुद्ध जीवन हेतु बोध
श्री गुरु और SRM टीम द्वारा
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प्रबुद्ध जीवन हेतु बोध

श्री गुरु और SRM टीम द्वारा
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यह प्रश्न और उनके समाधान श्री गुरु और कुछ मुमुक्षुओं के बीच लिखे emails से लिए गए हैं। साधक के विचार से और मार्ग पर चलते हुए जो प्रश्न उठते हैं, उनका श्री गुरु ने स्पष्ट और संक्षेप में उत्तर दिया है। जहाँ समर्पण की बाती होती है वहीं समाधान का दिया जलता है। जहाँ समाधान की ज्योत जलती है वहाँ शिष्य की पात्रता प्रगाढ़ होती है। ऐसे में हर प्रश्न मार्ग का अगला कदम बनता है। पढ़ें, विचार करें और आचरण में लाएँ।
प्रश्न – सभी जीवन शास्त्र कहते हैं कि जन्म के साथ ही मृत्यु का पल भी निश्चित हो जाता है। तो फिर इस महामारी के समय में हम ऐसा क्यों कहते हैं कि किसी की अकाल मृत्यु हो गयी है?
समाधान – प्रकृति के नियम सनातन होते हैं और जन्म के साथ ही मृत्यु का पल भी निश्चित हो जाता है। हमें जो अकाल मृत्यु लगती है वह उस व्यक्ति की मृत्यु का निश्चित ढंग था – ऐसा समझना चाहिए। महामारी के इस काल में कितने ही लोग शरीर त्याग कर रहे हैं, यह उनके आयुष्य कर्म के अनुसार ही हो रहा है – अन्यथा नहीं। जब कोई समुदाय एक साथ अशुभ कर्मों को बाँधता है तो उसका परिणाम भी समूह में ही आता है। जैसे कोई समुदाय एक साथ पटाखे जलाते हैं और अनेक जीवों की हिंसा करके खुश होते हैं तो उन सभी जीवों का अशुभ कर्म एक साथ बँधता है और महामारी के रूप में एक साथ उदय में आता है। जैसे – स्पेन के अंदर बैल-युद्ध (bull-fight) के आयोजन को लाखों लोग देखने आते हैं और और बैल को होती पीड़ा का उत्सव मनाते हैं। ये सभी सामूहिक रूप से कर्मों का बंध करते हैं जिसका परिणाम समूह में ही भोगना पड़ता है। रावण-दहन भी ऐसी ही एक प्रक्रिया है जिसमें असंख्य जीव एक साथ पाप कर्म बाँधते हैं और फिर उसका परिणाम ऐसे ही किसी प्राकृतिक प्रकोप से उन सभी जीवों को मिलता है।
प्रश्न – क्या मंत्र-स्मरण से अध्यात्म के मार्ग में आगे बढ़ा जा सकता है? यदि हाँ, तो कौन सा मंत्र उपयोगी होता है?
समाधान – जैसे आयुर्वेदिक उपचार में वात-पित्त-कफ के आधार पर औषधि की मात्राओं (dosage) और संयोजन (mixture) का निश्चय होता है, उसी प्रकार से हमारी प्रकृति के आधार पर प्रत्यक्ष सद्गुरू हमें आध्यात्मिक विकास के मार्ग को बताते हैं। स्वयं की इच्छा से कोई भी जप करने से थोड़े-बहुत शुभ विकल्प अवश्य लाए जा सकते हैं, परंतु स्वरूप को समझे बिना इनका अस्तित्व अधिक समय तक नहीं रहता। अवश्य मंत्र-स्मरण से हम इस मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं परंतु वह मंत्र-दीक्षा सद्गुरू से लेनी चाहिए, स्वच्छंद से नहीं।
प्रश्न – नहीं चाहते हुए भी जब हमारे भीतर संकल्प-विकल्प की धारा चलती रहती है और हम उन्हें कितने ही प्रयास के पश्चात् रोक नहीं पाते हैं, तब हमें क्या करना चाहिए?
समाधान – जैसे देखना आँखों का धर्म है, सुनना कानों का धर्म है उसी प्रकार से संकल्प-विकल्प करना मन का स्वतंत्र धर्म है। जब तक आँखें हैं तब तक देखना नहीं जा सकता लेकिन हम क्या देखें इसके लिए हम सदा स्वतंत्र होते हैं। उसी प्रकार से जब तक मन है तब तक संकल्प-विकल्प नहीं जा सकते। हाँ, ऐसा अवश्य हो सकता है कि तीव्र संकल्प-विकल्प की धारा में हम स्वयं को सत्संग या भक्ति में जोड़ दें जिससे संकल्प-विकल्प भी शुभ हो जाएँगें। अशुभ विचार मन को उद्विग्न करते हैं परंतु शुभ विचार मन में हल्कापन लाते हैं। जब तक जीव साधना के माध्यम से मन से पार जाने की कला नहीं सीख लेता तब तक शुभ विचारों में रहना साधक का कर्तव्य होता है।
प्रश्न – संकट के इस काल में हम अपने प्रत्यक्ष सद्गुरू से नहीं मिल पा रहे हैं परंतु ऐसे कितने ही साधक हैं जो इस काल में भी आप से मिलते हैं, आपके साथ रह पाते हैं। श्री गुरु, इसका क्या कारण समझना चाहिए?
समाधान – कारण एक ही है – कर्मसत्ता। सभी साधक जीवों का सद्गुरू के प्रति अत्यंत प्रेम होता है परंतु फिर भी कुछ जीव प्रत्यक्ष समागम में आ पाते हैं और कुछ नहीं आ पाते। इसका एक मात्र कारण है जीव के पूर्व-संचित कर्म। इस से पूर्व में जब हमें प्रत्यक्ष सद्गुरू का समागम हुआ होता है तब हम ने उसमें ऐसी अपूर्वता नहीं मानी होती, समागम के शीघ्र खत्म होने का इंतजार किया होता है, समागम में कुछ-न-कुछ प्रकार से दोष निकाले होते हैं, समागम में भी संसार भाव का सेवन किया होता है – ऐसे निकृष्ट कारणों से जीव इस प्रकार के कर्म बाँधता है कि उसे प्रत्यक्ष समागम का अंतराय हो जाता है। हो सकता है आपने ऐसे भाव इस जीवन में नहीं किए हो परंतु पूर्व के जन्मों में ऐसे भाव अवश्य किए होंगे जिसके परिणाम में आप अभी प्रत्यक्ष समागम के लाभ से वंचित रहते हैं। इसलिए साधक को स्वयं के उन पूर्व जन्मों के विस्मृत पापों की हृदय पूर्वक क्षमा-याचना करनी चाहिए।
प्रश्न – हम आपके सत्संग पिछले 2 वर्षों से देख रहे हैं और प्रत्येक सत्संग अपने में सम्पूर्ण लगता है और अनेक समाधान भी देता है। सत्संग के अंत में कराए गए सभी ध्यान-प्रयोग भी बहुत अच्छे लगते हैं लेकिन हम यह निश्चय नहीं कर पाते हैं कि कौन सा ध्यान प्रयोग हमें करना चाहिए और कौन सा नहीं। ऐसे में हमें क्या करना चाहिए?
समाधान – प्रत्येक सत्संग के अंत में होने वाली ध्यान विधि का संबंध उस सत्संग के विषय से होता है। सत्संग के माध्यम से जीव उस विषय को समझ तो लेता है परंतु उस विषय को साधक की चेतना के गहरे स्तर पर अंकित करने के लिए ध्यान प्रयोग करवाए जाते हैं। यदि आप दैनिक स्तर पर ध्यान प्रयोग करना चाहते हैं तो मिशन की ‘स्वराज क्रिया’ को सीखना होगा। यह क्रिया हमारी ही ऊर्जा को सक्रिय करके आंतरिक शुद्धिकरण का अपूर्व कार्य करती है।
प्रश्न – आपकी दी हुई ‘स्वराज क्रिया’ से मुझे ध्यान के समय में अद्भुत अनुभव होते हैं। लेकिन कितनी ही बार मैं भौतिकता में भी आकर्षित हो कर अनुचित कार्य करती हूँ। शीघ्र ही मुझे उसका पश्चाताप भी होता है परंतु मैं स्वयं को इस भोग-भाव से रोक नहीं पाती हूँ – ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए?
समाधान – अनुचित कार्य करने के पश्चात् उसका पश्चाताप होना – यही सूचित करता है कि आपके भीतर अध्यात्म के बीज डल रहे हैं। परंतु आप संसार-भोगों में भी आकर्षित हो जाते हैं यह बताता है कि भीतर वैराग्य भाव की कमी है। अभी संसार का स्वरूप सही ढंग से जाना नहीं और वास्तविक रूप से व्यर्थता का बोध उजागर नहीं हुआ। ऐसा अक्सर उन साधकों के साथ होता है जो सत्संग से अधिक महिमा ध्यान की रखते हैं। ध्यान की महिमा करने से और स्वराज क्रिया का दिव्य साधन होने से आप ध्यान के अपूर्व अनुभवों को तो प्राप्त कर लेंगे लेकिन सत्संग की महिमा कम होने के कारण (ध्यान की तुलना में) सांसारिक भोग में अभी आकर्षण बना रहता है। जो पुनः कर्म-बंध में जीव को उलझा देता है। इससे सावधान रहना चाहिए और सत्संग की महिमा को बढ़ाना चाहिए।
प्रश्न – श्री गुरु, हमारे पास बहुत समय है जिसमें हम अनेक सत्संग सुन सकते हैं, ध्यान कर सकते हैं और तपस्या का भी मन रहता है तो तप भी करते हैं। परंतु हम आपसे आज्ञा नहीं लेते हैं। मेरा प्रश्न है कि क्या यह सभी शुभ क्रियाएँ हमें आज्ञा ले कर करनी चाहिए?
समाधान – आपके पास बहुत समय है – यह पढ़ कर ही समझ में आता है कि आप में संसार भाव की मंदता है और उस समय का आप सदुपयोग कर रहे हैं। लेकिन अध्यात्म के जगत में ‘गुरु-आज्ञा’ से सत्संग-जप-तप आदि करने का विशेष महत्व है। इसका कारण यह है कि जब कोई भी शुभ क्रिया गुरू आज्ञा के बिना करी जाती है तो वह शुभ आश्रव (कर्म बंध) का कारण बनती है परंतु जब कोई शुभ क्रिया गुरू आज्ञा से करी जाती है तो वह ‘निर्जरा’ का कारण बनती है। अध्यात्म का सम्पूर्ण मार्ग शुभ कर्म बंध का नहीं है परंतु कर्म-निर्जरा का है। सद्गुरू भी जब कोई आज्ञा देते हैं तो उसमें कम-से-कम मात्रा की आज्ञा देते हैं, अधिक का निर्णय जीव की स्वयं की योग्यता और कर्म-सत्ता पर छोड़ देते हैं। जैसे – यदि आपका सत्संग देखने का भाव है तो सद्गुरू यही कहते हैं कि प्रतिदिन 30 मिनिट का सत्संग देखें। इसमें अधिक मात्रा में सत्संग देख पाना जीव का स्वयं का पुण्योदय है और इसे स्वच्छंद नहीं कहा जाता। यदि आप 30 मिनिट से कम देखते हैं तो यह आपका स्वच्छंद होगा जिसकी सावधानी पूर्वक क्षमापना करनी चाहिए। इसी प्रकार से जप-तप-ध्यान आदि में समझना चाहिए।
प्रश्न – श्री गुरु, हम आपके बताए हुए मार्ग पर चल कर स्वयं में रूपांतरण अनुभव कर रहे हैं परंतु एक भय सदा बना रहता है कि कहीं हम आपके बताए मार्ग से भटक ना जाए, कहीं हमसे कोई गलत आचरण ना हो जाए, कहीं हम पुनः परिभ्रमण के जाल में फँस ना जाए। मेरी दुविधा यही है कि मार्ग तो निर्भय होने का है और मैं मार्ग से पतित ना हो जाऊँ इसके भय में रहता हूँ। मेरी कहाँ गलती हो रही है कृपया समाधान करें।
समाधान – बहुत अच्छी बात हैं कि आप हमारे बताए मार्ग पर चल कर रूपांतरण का अनुभव कर रहे हैं परंतु हाँ, जब तक इस प्रकार का भय अंदर में है तब तक आंतरिक विकास नहीं होता और आत्मिक सुख का अनुभव नहीं हो सकता। भूल से भूल हो जाने का भय भी मार्ग में बाधक है और यह यही बताता है कि स्वयं में अभी कर्त्ता-भाव बहुत प्रगाढ़ता से पड़ा हुआ है। अभी ईश्वर की सत्ता पर श्रद्धा कर के स्वयं के जीवन को उसे सौंपा नहीं गया है। मार्ग पर चलते हुए पुरुषार्थ करने का कार्य साधक का स्वयं का है परंतु अनुकूलता की प्राप्ति और समय पर ज्ञान की उपस्थिति तो ईश्वरीय कृपा से ही होती है। ज्यों-ज्यों साधक का गुरु के साथ का संयोजन (connection) सुदृढ़ होता हैं त्यों-त्यों उसे यह दृढ़ विश्वास होता है कि जो कुछ भी होगा वह ईश्वरीय कृपा ही होगी। सफलता या असफलता दोनों ही मार्ग पर आगे बढ़ने के अगले कदम ही होते हैं। सफलता मार्ग पर चलने का हौंसला देती है तो असफलता कोई शिक्षा देती है। दोनों ही ईश्वर प्रसाद है – ऐसा जब साधक समझता है तो भय का भाव शिथिल हो जाता है। प्रातः उठ कर सबसे पहले ईश्वर से यही कहो कि मेरा आज का जीवन आपकी कृपा के अनुभव में थोड़ा और गहरा उतरे – यही प्रार्थना !
इन प्रश्नों के समाधान पढ़ते हुए यह स्वाभाविक है कि साधक के मन में कुछ नए प्रश्नों का जन्म हो। ऐसे में हम आपको अपने प्रश्न यहाँ लिखने के लिए आमंत्रित करते हैं। आपके परमार्थ संबंधित प्रश्नों का समाधान श्री गुरु से प्राप्त हो सकता है। समाधान प्रकाश के आगामी संकलन में कुछ प्रश्नों के समाधान प्रकाशित किए जाएँगें।
समाधान प्रकाश भाग 1 यहाँ पढ़ें: https://www.srmdelhi.org/blogs/2021/04/qna_with_sriguru/
ऐसे ही कुछ प्रश्नों पर विस्तार से पढ़ें "समाधान" किताब में। यहाँ पाएँ »
Bliss of Wisdom is a blog for seekers who are in search of their real self. It is published by Shrimad Rajchandra Mission Delhi – a spiritual revolutionary movement founded by Sri Guru. She is a spiritual Master who has transformed innumerable lives through her logical explanations and effective meditation techniques. To know more visit www.srmdelhi.org.
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प्रश्न 3 में, “विचारों को कैसे रोकें?” के समाधान में कहा गया है कि जब तक जीव साधना के माध्यम से मन से पार जाने की कला नहीं सीख लेता, तब तक शुभ विचारों में रहना साधक का कर्तव्य होता है। कृपया ‘मन से पार जाने की कला’ का अर्थ स्पष्ट करें। धन्यवाद।