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प्रबुद्ध जीवन हेतु बोध
श्री गुरु और SRM टीम द्वारा
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प्रबुद्ध जीवन हेतु बोध

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साधक के विचार से और मार्ग पर चलते हुए जो प्रश्न उठते हैं, उनका श्री गुरु ने स्पष्ट और संक्षेप में उत्तर दिया है। जहाँ समर्पण की बाती होती है वहीं समाधान का दिया जलता है। जहाँ समाधान की ज्योत जलती है वहाँ शिष्य की पात्रता प्रगाढ़ होती है। ऐसे में हर प्रश्न मार्ग का अगला कदम बनता है। पढ़ें, विचार करें और आचरण में लाएँ।
— श्री गुरु
प्रश्न: जब कोई साधक मन के पार जाता है तब क्या उसका अपने विचारों के साथ अपनत्व नहीं रहता? प्रभु, मन के पार क्या होता है?
समाधान: मन अर्थात् विचारों का संग्रह। जब तक जीव को स्वरूप की समझ नहीं हुई है तब तक मन के इस पार हो या उस पार कोई फर्क ही नहीं पड़ता। यदि मन के इस पार मोक्ष है तो मन के उस पार संसार है। स्व-अनुभव के पश्चात् ही यह भेद समझ में आता है। उससे पहले विचार के स्तर पर ऐसा निर्णय लिया जा सकता है कि विचार आदि मैं नहीं हूँ – इससे विचारों से अपनत्व मंद होता है। परंतु स्व-अनुभव के पश्चात् ही वास्तविक अपनापन टूटता है और साधक के सभी विचार अब उसे मन की सत्ता के संग्रह-रूप प्रतीत होते हैं। जैसे – मेरे घर में रही वस्तुएँ मुझे संग्रह रूप में दिखती हैं और आवश्यकता पड़ने पर हम उनका उपयोग कर लेते हैं। वैसे ही मुझे मेरे विचार भी मन-घर के संग्रहित परिणाम ही दिखते हैं। आवश्यकता अनुसार उनसे कार्य लेते हैं और तत्-पश्चात् उनके होने अथवा न होने से कोई अंतर नहीं पड़ता।
प्रश्न: श्री गुरु, हमारे पास आपको पूछने के लिए कभी कोई प्रश्न ही नहीं होता परंतु आपकी कृपा सदा महसूस होती है और यदि कोई प्रश्न उठता भी है तो समाधान अपने आप या आपके किसी बोध-वचन से मिल ही जाता है। क्या इसमें हमारे सोचने के ढंग में कोई ग़लती है?
समाधान: आपको कोई प्रश्न क्यों नहीं होता – यह भी एक प्रश्न ही है..! खैर, आपके भावों को समझते हुए हम जानते हैं कि ऐसे कितने ही मुमुक्षु हैं जिनके लिए सत्संग में सुनी हुई बातें ही अनेकों समाधान दे जाती हैं। सत्संग से सभी समाधान प्राप्त होने का मूल प्रयोजन मात्र यही है कि आप में सत्य के प्रति निष्ठा जागृत हो और एक सद्गुरु पर दृढ़ श्रद्धा का भाव विकसित हो। श्रीमद् जी लिखते हैं कि ज्ञानी से ज्ञान समझ कर उनके प्रति भक्ति प्रकट हो यही ज्ञान (सत्संग) का प्रयोजन है। उसमें भी इस काल में जीवों की स्मरण शक्ति इतनी मंद है कि सत्संगों में सुना हुआ ज्ञान याद भी नहीं रहता। इस काल के जीवों को सद्गुरु के वचन समझ में अवश्य आते हैं परंतु स्मरण में नहीं रहते तो समझ के आधार पर भक्ति प्रकट हो जानी चाहिए। और जिसमें इस प्रकार से भक्ति प्रकट होती है उसे सद्गुरु की कृपा सदा अनुभव में आती रहती है और जीवन में उठे प्रश्नों के समाधान भी स्वतः मिलते जाते हैं। आपके प्रश्न से ही यह निर्णय होता है कि आपमें अपने सद्गुरु के प्रति भक्ति का उदय हुआ है – यही श्रेष्ठ उपलब्धि है।
प्रश्न: अध्यात्म के मार्ग पर जब हम सत्संग, सद्गुरु और ध्यान के अवलंबन के साथ चलते हैं तो कई गुण हम में प्रकट होते हैं, फिर भी किसी एक विकार में हम अटके रहते हैं और मन वही हमें बार-बार दिखाता है, जिस से कभी-कभी अपने प्रति अविश्वास उत्पन्न होता है। ऐसे में हम अपने प्रति विश्वास कैसे बनाए रखें, कृपया मार्ग दर्शन करें।
समाधान: जब बार-बार हम किसी एक ही विकार में अटकते हैं तो इसका अर्थ ही यह है कि प्रकृति हमें उस विकार से बाहर आने का संकेत दे रही है। मन जब अपने ऊपर ही अविश्वास कर रहा है तो यही समझना चाहिए कि मन हमारे उस विकार से सहमत नहीं है इसलिए उस विकार को हटाने का सबल प्रयत्न करना चाहिए। कुछ विकार ऐसे होते हैं जो सत्संग में समझने से टल जाते हैं, अनेक विकार साधना से चले जाते हैं परंतु कुछ विकारों के लिए संयम की अनिवार्यता होती है। यह संयम दो प्रकार से लिया जा सकता है:
प्रश्न: मुझे लगता है कि सभी मंत्र (सोहम्, ॐ, शिवोहम् आदि) समान होते हैं लेकिन मेरी यह दुविधा रहती है कि मुझे कौन सा मंत्र करना चाहिए?
समाधान: मंत्र बीज-अक्षर होते हैं और जैसे प्रत्येक बीज का प्रयोजन अलग-अलग होता है वैसे ही प्रत्येक मंत्र का प्रयोजन और प्रयोग करने की विधि भी अलग-अलग होती है। सभी मंत्र समान नहीं होते। कोई मंत्र स्वयं में स्वरूप-निश्चय की दृढ़ता के लिए होते हैं जैसे ‘सोहम्’। कोई मंत्र स्वयं में रही ऊर्जा के संतुलन के लिए होते हैं जैसे ‘ॐ’। कोई मंत्र ईश्वरीय सत्ता से स्वयं की समरसता (harmony) स्थापित करने के लिए होते हैं जैसे ‘शिवोहम्’। और इन सभी मंत्रों के प्रयोग करने की शैली भी अलग-अलग होती है। इसलिए मंत्र-स्मरण की विद्या किसी समर्थ-सद्गुरु के पास से ही लेनी चाहिए। स्वच्छंद से किया हुआ मंत्र-स्मरण कितनी ही बार लाभ पहुँचाने के बदले नुकसान पहुँचा सकता है, क्योंकि मंत्र-स्मरण हमारे मस्तिष्क के एक विभाग को सदा सक्रिय रखता है जिसके विपरीत प्रभाव भी हो सकते हैं। इसलिए मंत्र का प्रयोग सावधानी से करें।
प्रश्न: हमें आपका प्रत्यक्ष समागम नहीं मिलता और यदि हम कोई नियम लेना चाहें तो आपसे आज्ञा कैसे लें? कभी-कभी लिए हुए नियम का उल्लंघन हो जाता है तो उसका पश्चाताप कैसे करें?
समाधान: आज्ञा दो प्रकार की होती है – व्यावहारिक आज्ञा और पारमार्थिक आज्ञा। SRM में पारमार्थिक आज्ञा एक ही है ‘स्वराज क्रिया’। इसके उपरांत जो छोटी-छोटी आज्ञाएँ दी जाती हैं वह व्यवहार शुद्धि के लिए ली जाने वाली प्रतिज्ञाएँ हैं इसलिए व्यावहारिक आज्ञा है। यह आज्ञा (प्रतिज्ञा) स्वयं की धारणा से लेनी होती है जिसके लिए प्रत्यक्ष समागम की अनिवार्यता नहीं है। इन नियमों के लिए आप चित्रपट के सामने (अथवा अपने घर में रहे किसी भी मंदिर स्थान के समक्ष) कोई भी पाठ-उच्चारण (नवकार मंत्र पाठ आदि) से कर सकते हैं। मंत्र-पाठ कम-से-कम तीन बार दोहराना चाहिए और फिर प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। कभी-कभी लिए हुए नियम का उल्लंघन हो जाता है तो उसके पश्चाताप में एक बार ‘क्षमापना’ पाठ को लिखने का नियम लेना चाहिए।
प्रश्न: श्री गुरु, सत्संग के समय में मैं अधिक समय तक एकाग्र नहीं रह पाती जो कि ग़लत है। ऐसे में हमें क्या करना चाहिए?
समाधान: किसी भी विषय में एकाग्र होने के पीछे कुछ कारण होते हैं, जैसे – जहाँ रुचि होती है वहाँ एकाग्रता स्वयं से आती है अथवा जिससे हमें लाभ दिखता है उसमें एकाग्रता बन जाती है। सत्संग में आपको रुचि है इसलिए आप देखते हैं परंतु फिर भी एकाग्रता नहीं रहती क्योंकि उससे होते हुए लाभ का कोई विशेष अनुभव नहीं हुआ है। मेरा आपको सुझाव है कि यदि सत्संग देखने की आपकी एकाग्रता 20 मिनिट की है तो 15 मिनिट ही सत्संग देखें। इससे यह लाभ होगा कि आपकी एकाग्रता होने के कारण समझा हुआ ज्ञान आपके अंतःकरण में जाएगा और जीवन में परिवर्तन होगा। जैसे-जैसे जीवन में परिवर्तन आता है वैसे-वैसे हमारी चेतना उस स्त्रोत (source) को खोजती है जहाँ से परिवर्तन आता है। फलतः हम पुनः सत्संग की ओर आकर्षित होंगे और अब एकाग्रता का समय भी बढ़ेगा क्योंकि लाभ का अनुभव हुआ है।
प्रश्न: प्रभु, सत्संग के पश्चात् समझ पूर्वक लिए हुए नियमों का पालन बहुत उल्लास से होता है परंतु जो नियम हमने बेहोशी में लिए थे उनका अब बंधन लगता है, बोझ लगता है। ऐसे में हमें क्या करना चाहिए?
समाधान: नियमों का पालन जब होशपूर्वक और उल्लासपूर्वक होता है तभी उनके परिणाम यथार्थ होते हैं। अध्यात्म की सम्पूर्ण मान्यता यही है कि जो नियम बेहोशी में लिए गए हों, होश आने पर उनका अस्तित्व विलीन हो जाता है। जैसे कोई स्वप्न-अवस्था में किसी से पैसे लेता है तो जागृत अवस्था में आने के पश्चात् उसे वह सम्पत्ति लौटानी नहीं होती। ठीक वैसे ही बेहोशी में लिए हुए नियम होश आने पर, समझ में आने पर अपना अस्तित्व खो देते हैं। यह एक क्रांतिकारी छलांग होती है जिसमें साधक को अपनी बेहोश अवस्था में लिए हुए नियमों की व्यर्थता का अहसास होता है और वह समझ पूर्वक इन बंधनों से आज़ाद हो जाता है। ऐसा करने में किसी के प्रति असम्मान का भाव नहीं होना चाहिए परंतु सत्य की समझ का बहुमान ही होना चाहिए।
प्रश्न: श्री गुरु, हम आपके प्रत्यक्ष समागम में वर्ष में 2-3 बार ही आ पाते हैं परंतु कितने ही मुमुक्षु अनेक बार आते हैं। हालाँकि हम आपके सत्संग और ध्यान विधियों को नियमित रूप से करते हैं परंतु प्रत्यक्ष समागम में नहीं आ पाने के कारण क्या हमारे विकास में अवरोध होता है?
समाधान: एक बात होती है कि मुमुक्षु प्रत्यक्ष समागम में आ नहीं पाता है, और दूसरी बात यह होती है कि वह आने की अधिक कोशिश ही नहीं करता। अपने सुविधा-क्षेत्र (comfort zone) से बाहर निकल कर यदि साधक आना नहीं चाहता तो यह सुनिश्चित है कि उसके आंतरिक विकास में अवरोध होगा। अध्यात्म की यह यात्रा है अनंत में लीन होने की और जो मुमुक्षु अभी अपनी संकुचित मान्यता और दायरों से ही नहीं निकलना चाहता वह कैसे इस यात्रा में आगे बाढ़ सकता है..! हाँ, यदि नहीं आ पाना आपकी कोई विवशता है जिसके लिए आपके अंतस में कोई खेद रहता है तो यह खेद-भाव आपकी आंतरिक भूमि का सिंचन करेंगे जो आपके विकास में अवश्य सहयोगी होगा। स्मरण रखें कि सद्गुरु का प्रत्यक्ष समागम कुछ समझने के लिए नहीं होता (वह तो YouTube से भी संभव है) परंतु प्रत्यक्ष समागम में सद्गुरु के ऊर्जा-क्षेत्र (energy-field) में प्रवेश कर के मुमुक्षु के ऊर्जा-क्षेत्र में एक अदृश्य परिवर्तन आता है जो स्वयं से लाने में बहुधा समय लग जाता है।
इन प्रश्नों के समाधान पढ़ते हुए यह स्वाभाविक है कि साधक के मन में कुछ नए प्रश्नों का जन्म हो। ऐसे में हम आपको अपने प्रश्न यहाँ लिखने के लिए आमंत्रित करते हैं। आपके परमार्थ संबंधित प्रश्नों का समाधान श्री गुरु से प्राप्त हो सकता है। समाधान प्रकाश के आगामी संकलन में कुछ प्रश्नों के समाधान प्रकाशित किए जाएँगें।
Bliss of Wisdom is a blog for seekers who are in search of their real self. It is published by Shrimad Rajchandra Mission Delhi – a spiritual revolutionary movement founded by Sri Guru. She is a spiritual Master who has transformed innumerable lives through her logical explanations and effective meditation techniques. To know more visit www.srmdelhi.org.
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