प्रबुद्ध जीवन हेतु बोध

श्री गुरु और SRM टीम द्वारा

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ये कैसा दस्तूर है प्रेम की इबादत का,करें कैसे बयां रोशनी के रंगीन दरिया का?कभी तो सभी कुछ हो जाता है हमसे दूर और ओझल, और कभी रह जाते...

प्रेम की जन्नत

कायनात में है न प्रेम से बढ़कर रहबर कोई,रहते हैं प्रियतम जहाँ, दिखाता ये रास्ता वही!जीवन के रंगमंच को ये, भरपूर गुणों से देता है...

मुक्ति नहीं, मिलन चाहिए

सुबह की बेला में था कुछ अजब सा सुरूर,बह रहा था प्रेम-द्वार से बस नूर ही नूर! हम खो रहे थे कि पा रहे थे ख़ुद को, फैसला अभी हो न पाया...