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प्रबुद्ध जीवन हेतु बोध
श्री गुरु और SRM टीम द्वारा
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प्रबुद्ध जीवन हेतु बोध

श्री गुरु और SRM टीम द्वारा
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मुझे प्रसन्नता है कि समाधान प्रकाश के चार प्रकाशन के अंतर्गत आप सभी की अनेक दुविधाओं का समाधान हुआ है। जब तक साधक में रहे प्रश्नों के समाधान नहीं होते तब तक उसके विकल्पों की स्थिति ऐसी होती है कि वह उसे साधना के अगले पड़ाव पर जाने में बाधक हो जाते हैं। इसलिए समाधान का प्रकाश आवश्यक है। मुझे यह भी प्रसन्नता है कि इन समाधान को प्राप्त करके साधकों के भीतर विविध विषयों पर उठते हुए प्रश्न कम होते जा रहे हैं। इसलिए इस बार के प्रकाशन में मिशन के चार आधार (प्रेम, सेवा, संयम, साधना) में से प्रथम आधार ‘प्रेम’ के विषय में मेरे पास आते कुछ प्रश्नों का समाधान करेंगें।
– श्री गुरु
प्रश्न: SRM के अंतर्गत पथ-प्रकाशित करते हुए आपने ‘प्रेम’ को पहला आधार बताया है। इस ‘प्रेम’ का क्या स्वरूप है? समाधान: ‘प्रेम’ अर्थात् ऐसी मान्यता का सुदृढ़ होना कि यह संपूर्ण अस्तित्व संयुक्त है (Everything is connected)। जन्मोंजन्म के अज्ञान के कारण हम इस मूल तथ्य को ही भूल गए हैं और अहंकार के कारण हमने बहुत सारे अज्ञात विभाजन कर लिए हैं। कभी जाति तो कभी वेष, कभी धर्म तो कभी राष्ट्र, कभी अमीर तो कभी गरीब, कभी अपना तो कभी पराया – ऐसे अनेक प्रकार के विभाजन करके हमने स्वयं के अज्ञान और अहंकार का पोषण किया है। ‘प्रेम’ अर्थात् इन अज्ञात दीवारों को गिरा देना क्योंकि जो विभाजन है वह बहुत ही ऊपरी स्तरों पर है। भीतर सभी में एक ही सत्ता है और वह सत्ता संयुक्त है। यहाँ सभी कुछ एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है।
प्रश्न: श्री गुरु, सभी के प्रति प्रेम की अनुभूति होती है परंतु किसी एक-दो संबंधियों के साथ प्रेम की भावना भी नहीं होती और व्यवहार भी नहीं हो पाता। दुःख भी होता है कि सभी के साथ एक जैसा प्रेम क्यों नहीं हो पाता? ऐसे में हमें क्या करना चाहिए? समाधान: जब किसी एक-दो संबंधियों के साथ हम प्रेम की भावना से नहीं भर पाते और ऐसा व्यवहार भी नहीं कर पाते हैं, तो अपने भीतर अवलोकन करना चाहिए क्योंकि उनके प्रति कोई पूर्व की द्वेष की गाँठ है जिसको अभी हटाया नहीं गया है। सबसे पहले क्षमापना के माध्यम से उस द्वेष-भाव के प्रति पश्चाताप करना चाहिए। उसके पश्चात् यदि वह व्यक्ति उपस्थित है तो उससे क्षमा-याचना करनी चाहिए और बार-बार मान्यता के स्तर पर उस संबंध को अपने ही पूर्व कर्मों की file समझ कर स्वीकार करना चाहिए। हृदय के शुद्ध भावों से इतना करने के पश्चात् भी यदि उस व्यक्ति के प्रति स्वाभाविक रूप से ‘प्रेम’ का भाव नहीं आता हो, तो इसे भी अपना ‘ऋणानुबंध’ समझ कर स्वीकार करना चाहिए।
प्रश्न: कितनी ही बार सामने वाले हमारी प्रेम की अभिव्यक्ति को हमारी कमजोरी अथवा निर्भरता समझ लेते हैं – ऐसे में क्या प्रेम की अभिव्यक्ति करना उचित होता है? समाधान: प्रेम की अभिव्यक्ति का कारण स्वयं के भीतर होना चाहिए, दूसरों पर आधारित नहीं होना चाहिए। हाँ, प्रेम के साथ-साथ विवेक का भी उदय होता है इसलिए साधक जीव को यह अवश्य ज्ञात होना चाहिए कि उसकी अभिव्यक्ति ऐसी न हो कि किसी का कोई विपरीत अनुमान हो जाए। स्वरूप की निश्चित अनुभूति के पश्चात् तो सम्पूर्ण अस्तित्व के प्रति प्रेम उछलता है, परंतु यदि इस प्रेम की अभिव्यक्ति करी जाए तो सामान्य जन इसे पागलपन ही समझेंगें। सही समय के आने पर विविध प्रकार से प्रेम की अभिव्यक्ति का भाव साधक के अंतरंग में स्वयं प्रकाशित होता है।
प्रश्न: आपके बताए हुए ‘प्रेम’ और लौकिक प्रेम में क्या अंतर है? समाधान: ‘प्रेम’ का परमार्थ स्वरूप ही वास्तविक प्रेम है। लौकिक प्रेम वास्तव में प्रेम नहीं राग है, आकर्षण है, मोह है, आसक्ति है। परमार्थ प्रेम में साधक स्वयं का उपयोग दूसरों की खुशी, सेवा, आवश्यकता आदि के लिए करता है। इस प्रेम में साधक जीव को सभी के भीतर रहे उस ‘परम तत्त्व’ का बोध सदा रहता है। व्यवहार के स्तर पर ऐसे ‘प्रेम’ से भरे हृदय में विवेक भी प्रकाशित होता है इसलिए कहाँ क्या कहना, कैसे करना, कितना बोलना इत्यादि की समझ भी सहज रूप से होती है। परमार्थ प्रेम में साधक में विवेक, निष्कामता और समावेशिता के तीन प्रमुख गुण उजागर होते हैं।
प्रश्न: स्वयं के भीतर ‘प्रेम’ को बढ़ाने के लिए हमें क्या करना चाहिए? समाधान: परमार्थ ‘प्रेम’ की वृद्धि तीन प्रकार से होती है:
प्रश्न: यदि साधना के माध्यम से हम ‘प्रेम’ स्वरूप हो सकते हैं तो साधना को मिशन का प्रथम आधार क्यों नहीं कहा गया है? समाधान: प्रेम के विविध स्तरों (बौद्धिक और हार्दिक) से पसार हुए बिना कभी भी प्रेम हमारा स्वभाव नहीं बन सकता। अहंकार की यह एक चाल होती है कि वह साधना के माध्यम से तो शुद्ध होने की योजना बनाता है, परंतु दैनिक जीवन में दूसरों के आगे झुकना या समावेशी (inclusive) होना नहीं चाहता। इस अहंकार की आड़ में करी हुई कोई भी साधना जीव को उसके लक्ष्य तक नहीं पहुँचा सकती। पहले सद्गुरु के प्रति की प्रेम की धारा में बह कर विवेक जगाना है, संसार के प्रति निष्काम भाव को प्रकट करना है और हृदय को संवेदनशील बनाना है। जब तक इतनी भूमिका नहीं बनती है, तब तक जीव साधना के लिए भी तैयार नहीं हो सकता।
प्रश्न: क्या ‘प्रेम’ की शत प्रतिशत (100%) अनुभूति के पश्चात् ही साधक अगले आधार सेवा-संयम-साधना पर जा सकता है, या फिर प्रेम के साथ-साथ ही बाकी के आधारों का भी समग्र विकास होता है? समाधान: प्रेम-सेवा-संयम-साधना एक समग्र विकास की यात्रा है। आरंभ प्रेम से करना है क्योंकि जब तक मान्यता नहीं बदलती, तब तक आचरण भी यथार्थ रूप से नहीं बदल सकता। परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि साधक जीव पहले पूरा-पूरा प्रेम से भरेगा उसके पश्चात् ही सेवा करेगा। नहीं, जितनी मात्रा में प्रेम का उदय हुआ है उतनी ही उसकी अभिव्यक्ति सेवा में होगी और संयम के नियम उसे रुचिकर लगेंगें। जब इतनी तैयारी के साथ साधक जीव अब साधना के मार्ग में प्रवेश करता है, तो उसे ‘प्रेम’ का अनुभवात्मक स्वरूप उघड़ता है और वह वास्तव में अनुभव कर पाता है कि यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड जुड़ा हुआ है, अविभाज्य है। यहाँ किसी के प्रति क्रोध करना यानि स्वयं को ही दुःख पहुँचाना है, क्योंकि हम जो कुछ भी करते हैं वह अभी या कभी लौट कर हम पर ही आता है।
प्रश्न: जब यह परमार्थ ‘प्रेम’ हम दूसरों से करते हैं तो क्या दूसरा भी अनिवार्य रूप से हम से करता ही है या फिर यह प्रेम एक-तरफ़ा ही होता है? समाधान: ‘प्रेम’ कभी भी एक-तरफ़ा नहीं होता, समग्र होता है। लौकिक प्रेम में ऐसी अवधारणा होती है कि यदि कोई किसी से प्रेम (राग) करता है तो उसकी पूर्ति की अपेक्षा रहती है। परंतु परमार्थ ‘प्रेम’ में मनुष्य स्वयं ही इतना प्रेम की ऊर्जा से समृद्ध होता है कि जब वह प्रेम के आधीन हो कर कुछ भी करता है, तो बदले में उसे कोई भी अपेक्षा नहीं रहती। कुछ पाने के लिए कुछ करना यह प्रेम नहीं है, परंतु कुछ ऐसा पाया है जिसके बदले में हम कुछ करना चाहते हैं – यही वास्तविक प्रेम है। साधक को अपने भीतर यह अवलोकन करना चाहिए कि उसके जीवन में कितना प्रेम का आविर्भाव है और कितना अभी राग का ही विस्तार है। एक-दो बार निष्काम कर्म करने से कोई प्रेम का धारक नहीं हो जाता परंतु जब बार-बार निष्कामता प्रकट होती है, तभी जीव वास्तविक रूप से प्रेम की पूँजी का धारक होता है। यही प्रेम मिशन के चार आधारों में से प्रथम आधार है।
इन प्रश्नों के समाधान पढ़ते हुए यह स्वाभाविक है कि साधक के मन में कुछ नए प्रश्नों का जन्म हो। ऐसे में हम आपको अपने प्रश्न यहाँ लिखने के लिए आमंत्रित करते हैं। आपके परमार्थ संबंधित प्रश्नों का समाधान श्री गुरु से प्राप्त हो सकता है। समाधान प्रकाश के आगामी संकलन में कुछ प्रश्नों के समाधान प्रकाशित किए जाएँगें।
Bliss of Wisdom is a blog for seekers who are in search of their true self. It is published by Shrimad Rajchandra Mission Delhi – a spiritual revolutionary movement founded by Sri Guru. She is a spiritual Master who has transformed innumerable lives through her logical explanations and effective meditation techniques. To know more, visit www.srmdelhi.org.
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ये कैसा दस्तूर है प्रेम की इबादत का,करें कैसे बयां रोशनी के रंगीन दरिया का?कभी तो सभी कुछ हो जाता है हमसे दूर और ओझल, और कभी रह जाते...
कायनात में है न प्रेम से बढ़कर रहबर कोई,रहते हैं प्रियतम जहाँ, दिखाता ये रास्ता वही!जीवन के रंगमंच को ये, भरपूर गुणों से देता है...
सुबह की बेला में था कुछ अजब सा सुरूर,बह रहा था प्रेम-द्वार से बस नूर ही नूर! हम खो रहे थे कि पा रहे थे ख़ुद को, फैसला अभी हो न पाया...
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