हममें से कई लोग “एक दिन” नाम की बीमारी के साथ जी रहे हैं।
एक दिन, मैं एक आदर्श आध्यात्मिक दिनचर्या का पालन करूँगा।
एक दिन, मैं अपने क्रोध पर संयम प्राप्त कर लूँगा।
एक दिन, मेरे पास मानवता की सेवा के लिए पर्याप्त समय होगा।
लेकिन, पार्किंसन के नियम के अनुसार, वह “एक दिन” आपकी मृत्यु का दिन भी हो सकता है, क्योंकि “कोई भी कार्य अपनी पूर्ति के लिए उपलब्ध समय को भरने के लिए विस्तृत हो जाता है”।
यदि आपको लगता है कि एक आदर्श साधक बनने के लिए अभी तो पूरा जीवन शेष है, तो सच में पूरा जीवन व्यतीत हो जाएगा। और ऐसे रूपांतरण का क्या लाभ, जिसके फल का अनुभव करने के लिए जीवन ही नहीं बचे?
जिस प्रकार हम अपने करियर, स्वास्थ्य और संपत्ति के लिए सविस्तार योजना बनाते हैं, उसी प्रकार हमें आध्यात्मिक लक्ष्य-निर्धारण और योजना के लिए भी समय देना चाहिए। इस योजना का आरंभ आप निम्नलिखित प्रश्नों से कर सकते हैं –
- इस वर्ष मैं कौन से दोष से मुक्ति चाहता हूँ?
- इस वर्ष मैं कौन से एक सद्गुण को विकसित करना चाहता हूँ?
- मैं मानवता की सेवा के लिए अपने समय और ऊर्जा का बेहतर उपयोग कैसे कर सकता हूँ? इसके लिए मुझे कौन से कौशल विकसित करने की आवश्यकता है?
- अपने आध्यात्मिक लक्ष्यों में सफलता के लिए मुझे अपनी साप्ताहिक और मासिक योजना में कौन-सी क्रियाएँ शामिल करनी चाहिए?
ये प्रश्न मात्रा सुझाव हैं; सबसे सार्थक प्रश्न आपके अपने आत्मनिरीक्षण से ही निकलेंगे।
स्मरण रखें, एक स्पष्ट योजना बनाना अर्थात् लक्ष्य की ओर आधी दूरी तय कर लेना।
जय कृपालु,
धैर्य और स्थिरता के महत्व को समझने के लिए यह एक बहुत ही उपयोगी और प्रेरक लेख है…. मैं अपने जीवन में इन गुणों को विकसित करने के लिए प्रयास करने का संकल्प लेता हूँ और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए नियमित रूप से काम करने का प्रयास करूँगा… यह पोस्ट मेरे दिल को छू गई और मुझे अपने जीवन में सकरात्मकता लाने के लिए प्रेरित किया….
अहो, अहो उपकार श्री गुरु!