सद्गुरू की प्रेम समाधि! अब शब्द नहीं, मौन में संपर्क होता है।
जब मौन में बैठ कर यह प्रेम तरंगें पुकार करती हैं तो जो हृदय प्रेम के लिए लालायित होते हैं उनका हृदय तरंगित हो जाता है। समय और स्थान इस पुकार में बाधा नहीं बनते क्योंकि यह प्रेम की तरंगें समय और स्थान से अतीत हैं। इन प्रेम-तरंगों को अपने हृदय में आंदोलित करने के लिए बस मुक्ति की आतुरता चाहिये और समर्पण का आधार चाहिये।
समर्पण वह आधार है जो मनुष्य को अंधेरों में भी नाव चलाने का साहस दे जाता है। भीतर कोई ऐसी आवाज़ सुनाई देती है जिसकी पुकार को अब टाला नहीं जा सकता है। और इसलिए मन यह दुस्साहस करता है और किनारों की सुरक्षा को छोड़ने लगता है। जो इतने साहस से इस पुकार के पीछे निकल पड़ते हैं उनके लिये मझधार भी किनारे हो जाते हैं और खो कर भी वह स्वयं को पा जाते हैं।
बस, आवश्यकता है हृदय में मुक्ति की आकांक्षा को जगाने की। यह अभिलाषा ही सोये हुए हृदय को जागृत करती है। संसार की वस्तुएँ पाने के लिए शरीर-मन-बुद्धि की सक्रियता चाहिये लेकिन परमात्मा को पाने के लिए तो हृदय को सक्रिय करना होगा। यह सक्रिय हुआ हृदय ही सद्गुरू के हृदय की पुकार सुन पाता है और सुन कर उस अज्ञात की दिशा के अदृश्य पदचिह्नों के पीछे चल पड़ता है – यही सद्गुरू के हृदय में उठ रही प्रेम समाधि की पुकार है जो प्रेमी के हृदय में पहले धीरे-धीरे सुनाई देगी, लेकिन यदि तुम उस राह निकल पड़े तो यात्रा दुर्निवार (unstoppable) हो जायेगी..!
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