एक बार एक संत थे जो देवी माँ के अनन्य भक्त थे। वे अपने शिष्यों को एक छोटे से आश्रम के परिसर में शिक्षा देते थे, जिसमें एक देवी मंदिर भी था।
एक दिन, जब संत अपनी दैनिक प्रार्थना और ध्यान के लिए मंदिर जाने के लिए तैयार हो रहे थे, तो उनका एक शिष्य उनके पास आया और बोला, “प्रभु, देवी माँ आपकी सभी प्रार्थनाएँ सुनती हैं। क्या आप मेरी ओर से भी माँ से प्रार्थना कर सकते हैं? मैं भी उनके दिव्य रूप को देखना चाहता हूँ!”
शिष्य की इस शुद्ध प्रार्थना से प्रसन्न होकर, संत ने मुस्कुराते हुए उसे आश्वासन दिया, “अवश्य, मेरे प्रिय बालक!”
उसी दिन संध्या के समय, शिष्य संत के कक्ष में गया और उत्साह से पूछा, “प्रभु, क्या आपने मेरे लिए प्रार्थना की?”
संत इस प्रश्न से स्तब्ध रह गए, और क्षमा मांगते हुए बोले, “मैं आज प्रार्थना नहीं कर सका। परन्तु कल अवश्य करूँगा।”
कई दिनों तक यही घटना दोहराती रही।
अंततः शिष्य ने अपना धैर्य खोकर, निराशा और हताशा महसूस करते हुए संत से पूछा, “प्रभु, पिछले इतने दिनों से मैं आपसे मेरे लिए प्रार्थना करने की विनती कर रहा हूँ। आप हर बार आश्वासन देते हैं, परंतु अब तक एक बार भी आपने प्रार्थना नहीं की?”
संत ने बच्चों जैसी मासूमियत के साथ उत्तर दिया, “मेरे प्रिय बालक, मैं वास्तव में तुम्हारे लिए प्रार्थना करना चाहता हूँ। परंतु मैं क्या करूँ, जैसे ही मंदिर में प्रवेश करता हूँ, मैं रहता ही नहीं हूँ! केवल देवी माँ ही रह जाती हैं!”
यदि प्रार्थना में है ज़िंदा कोई फ़रियाद, तो मिलेगा नहीं उसका आशीर्वाद,
यदि प्रार्थना में हैं दोषों की शिकायतें, तो बरसेंगी नहीं उसकी रहमतें,
यदि प्रार्थना में है दूसरों के लिए गुज़ारिश, तो भी न होगा उससे कुछ हासिल,
प्रार्थना तब तक न होगी मुकम्मल, जब तक ‘तुममें’ और ‘उसमें’ है ज़रा भी दूरी शामिल…
– खलील जिब्रान विरचित ‘द प्रोफेट’ से अनुवादित
उनके दीद में ऐसा खोया था, तसव्वुर मेरा
भूल गया सजदे में औकात अपनी।
बातें नूरानी थी उनकी,
भर गए जीवन में रंग कईं।