विरोधाभासी मान्यताओं और दर्शनों से भ्रमित होकर, एक साधक ने अपने अस्तित्व के प्रश्नों का समाधान प्राप्त करने के लिए ध्यान सीखने का फैसला किया। परंतु एक प्रत्यक्ष सद्गुरु के मार्गदर्शन में केवल एक सप्ताह के अभ्यास के बाद, वह लगभग हार मानने को तैयार था…
साधक: ध्यान बहुत कठिन है।
गुरु: तुम्हें ‘मैं हूँ’ का अनुभव नहीं, इसलिए ध्यान कठिन लगता है।
साधक: ध्यान में ‘मैं हूँ’ का अनुभव कब होता है, गुरुदेव?
गुरु: जब ‘मैं’ और ‘हूँ’ के बीच जो भी हो वो सब त्याग दिया जाए।
साधक: ‘मैं’ और ‘हूँ’ के बीच कुछ कैसे आ जाता है?
गुरु: ‘मैं’ का अज्ञान ही ‘मैं’ और ‘हूँ’ के बीच की दूरी का कारण है।
साधक: अज्ञान को कैसे तोड़ते हैं?
गुरु: ‘मैं’ और ‘हूँ’ के बीच की इस दूरी को मिटाते जाओ, अज्ञान लुप्त होता जाएगा।
साधक:‘ मैं’ और ‘हूँ’ के बीच की दूरी कैसे मिटती है?
गुरु: प्रण लो, प्रदक्षिणा लगाओ, प्राप्त करो और प्रेम हो जाओ।
ध्यान का नियमित रूप से अभ्यास करने का प्रण लो।
अपने स्वछंद को त्याग कर एक प्रत्यक्ष सद्गुरु के मार्गदर्शन की प्रदक्षिणा करो।
सही ध्यान विधि के माध्यम से ‘मैं हूँ’ के अनुभव को प्राप्त करो।
अपने संपूर्ण अस्तित्व से प्रेम बहने दो, और प्रेम हो जाओ..!
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