जब आप रात को सोने जाते हैं, तो यह विश्वास कहाँ से आता है कि आप सुबह उठेंगे ही?
जब आप भीतर श्वास लेते हैं, तो क्या इस बात पर संदेह करते हैं कि श्वास बाहर जाएगी या नहीं?
आपको कैसे पता कि आपका पसंदीदा भोजन शरीर में प्रवेश करने के बाद पेट तक पहुँच ही जाएगा?
जब आप किसी विमान में चढ़ते हैं, तो आप कॉकपिट में बैठे एक अजनबी को अपने जीवन का नियंत्रण क्यों सौंप देते हैं?
आप अवश्य कह सकते हैं कि ये सभी तर्कसंगत घटनाएँ हैं, जिनका समर्थन विज्ञान (science) और सांख्यिकी (statistics) द्वारा किया जा सकता है। हम जानते हैं कि सभी वैज्ञानिक निष्कर्ष मन और बुद्धि द्वारा किये गए निरीक्षण, विचार और तर्क पर निर्भर करते हैं। परंतु जिस क्षण हमें यह एहसास होता है कि ये सभी प्रकार के विचार, तर्क-वितर्क आदि ब्रह्मांड के अनंत संयोजनों का केवल एक अत्यंत छोटा सा अंश हैं, तो एकमात्र तार्किक निष्कर्ष बचता है जिसे हम ‘श्रद्धा’ के नाम से जानते हैं।
श्रद्धा के बिना जीवन असंभव है। यहाँ तक कि विज्ञान भी अदृश्य रूप से श्रद्धा पर ही चलता है। ज़रा विचार करें, एक वैज्ञानिक किसी सिद्धांत का परीक्षण करने का कष्ट क्यों उठाएगा, यदि उस सिद्धांत की सत्यता के विषय में उसे प्रारंभिक श्रद्धा नहीं हो?
श्रद्धा तर्क से परे है। और पूरी तरह से तर्कसंगत भी।
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