रेलगाड़ी में सफ़र करते हुए क्या आपने कभी अनुभव किया है कि जब आपकी रेलगाड़ी स्थिर होती है और सामने से दूसरी रेलगाड़ी गुज़रती है, तो यह भ्रम पैदा होता है कि आप विपरीत दिशा में जा रहे हैं? हालाँकि, यदि आप दोनो रेलगाड़ियों के बीच किसी स्थिर वस्तु पर ध्यान केंद्रित करें, तो यह तुरंत स्पष्ट हो जाता है कि आप भी स्थिर हैं।
इस दृष्टांत में जीवन का एक गहन रहस्य छुपा है। शरीर-मन-बुद्धि की ‘रेलगाड़ी’ में यात्रा करते हुए, हम अक्सर जीवन के गुज़रते दृश्यों में फंस जाते हैं। शाश्वत और सदा-स्थिर होने के बावजूद, सामने से पसार होती क्षणिक मायिक परिस्थितियों को देखकर स्वयं भी अस्थिर और परिवर्तनशील होने का भ्रम कर बैठते हैं!
तो समाधान क्या है? यही, कि यदि हमारी दृष्टि किसी ‘स्थिर मनुष्य’ पर पड़ गई, एक ऐसा मनुष्य जो परिवर्तनशील जगत में रहते हुए भी जानता है कि वह बिल्कुल स्थिर है, तो हमारा भ्रम भी टूटने लगता है। हमें स्वयं की स्थिरता का भान होने लगता है। जगत की लीला और हमारे आत्म तत्त्व के स्थिर, शाश्वत सत्य के बीच का अंतर धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगता है।
समाधान सरल है ना? हाँ, यदि उस ‘स्थिर मनुष्य’ की पहचान हो जाए तो।
“जगत को, जगत की लीला को बैठे बैठे मुफ्त में देख रहे हैं।”
– श्रीमद् राजचन्द्र जी, वचनामृत 165
जय कृपाडू प्रभु 🙏
समाधान तो सरल हो जाते हैं हम जब भी आपकी वाणी से सुनते हैं। लेकिन मेरी सिथरता की अवधि कम है, लेकिन इतना विश्वास है कि आपकी कृपा में यह जल्द ही ठीक हो जाएगा।
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