है अनादि काल की बात ये,
जब नहीं अस्तित्व में कोई “दो” थे,
बस था अखंड “एक” महासागर,
ओढ़े एक्यता की सुनहरी चादर!
फिर आया समय दिव्य लीला का,
बूँद का सागर से दूर होने का,
“कुछ ही देर की तो बात है!” ऐसा सोचकर,
चल दी बूँद सागर को पीछे छोड़कर…
और शुरू हुआ सबसे भीषण चक्र,
इतिहास में सबसे भयंकर!
“अरे! ये मैं कहा? यहाँ तो है बस रेत और ताप!”
बूँद को थी न खबर, कि मिलेगा उसे ऐसा संताप!
आरंभ करी फिर बूँद ने खोज, कि कहीं तो मिलेगा पानी,
तेज़ तपती गर्मी में भी, बूँद ने अपनी हार न मानी,
पर कैसे होती पूरी इस मरुस्थल में उसकी तृष्णा?
यहाँ पानी तो था नहीं, दिखती थी केवल एक मृगतृष्णा!
ऐसे करते-करते हो गया बहुत समय पसार,
और मिटने लगे बूँद की आशा के सभी आसार…
वो भूलने लगी अस्तित्व में है कोई महासागर,
लगने लगा उसे है बस अब यही रेत-ताप का सीमित गागर!
बूँद बहुत चिल्लाई, पर थी न यहाँ उसकी कोई सखी,
सागर से मिलने की उसकी चाह भी अब थमने लगी…
पर बूँद को था नहीं पता, कि सागर को तो है सब खबर!
वह सागर-किनारे ही तो थी खड़ी, और सागर उसके एक कदम पर!
बूँद के सफ़र का बस इतना सा था सार,
कि घूम जाना था उसे, सुन के सागर की पुकार!
जब वो घूमी तो हुई मदमस्त पूरी,
क्योंकि सागर ने मिटा दी बीच की सारी दूरी!
कर दिया सागर ने अपने प्रेम का यूँ इज़हार,
कि हुआ ख़त्म बूँद का युगों-युगों का इंतज़ार!
बूँद के लिए यह अद्भुत मिलन था उसके दुखों का अंत,
पर सागर तो है हर दुख से परे, समाये अपने में प्रेम अनंत!
सागर नहीं जानता कोई भी दुख या कलेश,
उस असीम के उच्चतम प्रदेश में मिलता नहीं किसी निम्न को प्रवेश!
ऐसे बूँद से वापस सागर होकर,
व्यापक, असीम और निराकार होकर,
हुआ संपन्न बूँद का भयानक सफ़र,
और किया उसने संकल्प – अब कभी न छूटे प्रेम का घर!
अब कभी ना छूटे प्रेम का घर,
यही है प्रभु से प्रार्थना..🙏🏼
एक बूंद की आत्मकथा अति मार्मिक ढंग से गाने का हमें पुकारने के अनंत शुक्राने।
सागर उछलता है हर बूंद के वास्ते..आपके ऐसे अथाह प्रेम को बारंबार वंदन, नमन!
प्रभु जी अब हमें लगता है आपने इतना सिखा दिया है कि हम अपने सागर से मिल ही जाएंगे! थैंक यू प्रभु जी।