एक यात्री बंजर रेगिस्तान में भटक रहा था कि अचानक वह एक चिराग से टकराया। जादुई चिरागों की कथाओं को याद करते हुए, उसने जिज्ञासा और उम्मीद के साथ उस चिराग की सतह को रगड़ा। और उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब रेत का एक बवंडर शुरू हो गया, और उस बवंडर के बीच में से एक जिन्न प्रकट हुआ।
जिन्न ने झुककर कहा, “मेरे मालिक! मैं आपकी सेवा में उपस्थित हूँ। आप कोई भी तीन इच्छाएँ माँग सकते हैं। मैं आपको अमरता नहीं दे सकता, लेकिन उसके सिवाय इस कायनात की हर वस्तु आपसे बस एक इच्छा की दूरी पर है।”
यात्री को थोड़ा संदेह हुआ, इसलिए उसने सावधानी से शुरुआत की। “मेरे सफ़र के लिए पर्याप्त भोजन और पानी दे दो।”
“जो हुक्म!” भोजन और पानी से लदे ऊंटों का एक काफिला वहां प्रकट हो गया।
उत्तेजना से भरकर उस यात्री ने अब अपनी कल्पनाओं को उड़ान देना शुरू किया।
“मुझे एक सुंदर स्त्री का साथ चाहिए।”
“जो हुक्म!” और पलक झपकते ही, एक स्वर्ग की अप्सरा जैसी सुंदर स्त्री उसका हाथ थामे उसके पास खड़ी थी।
अब उसे तीन इच्छाओं तक सीमित रहना स्वीकार नहीं था। उसकी महत्वाकांक्षा ने उफान मारकर कहा – “मुझे तीन और इच्छाएँ दो।”
“जो हुक्म!”
उस यात्री ने आगे बढ़ने से पहले कुछ समय विश्राम करने का निर्णय लिया। उसने सोने से भरे एक महल की इच्छा की, और जिन्न ने उस इच्छा को भी पूरा कर दिया। लेकिन वह यात्री वास्तव में कभी विश्राम नहीं कर पाया; क्योंकि हर दो इच्छाएँ पूरी होने के बाद, वह अपनी तीसरी इच्छा का उपयोग और अधिक इच्छाएँ हासिल करने के लिए करता था। देखते ही देखते, वह रेगिस्तान एक स्वर्ग में बदल गया।
और यह सिलसिला वर्षों तक चलता रहा, और अंततः वह यात्री अपनी मृत्युशैया पर पहुँच गया।
उसकी अंतिम इच्छा एक दर्द भारी धीमी-सी आवाज़ में निकली: “यह सुनिश्चित करो कि अगले जन्म में भी मुझे यह चिराग मिले।”
“जो हुक्म”, जिन्न ने एक आख़िरी बार कहा।
जब यात्री अपनी अंतिम सांसें लेने लगा, तो जिन्न के चेहरे पर एक डरावनी मुस्कान फैल गई। “मैंने तुमसे कहा था कि तुम्हारे पास केवल तीन ही इच्छाएँ हैं,” जिन्न ने एक भयानक, राक्षसी आवाज़ में कहा। “तुमने पूरा जीवन यह सोचकर बिता दिया कि तुम मुझे धोखा दे रहे हो। अब मुझे बताओ, मेरे मालिक… वास्तव में धोखा किसे मिला?”
यात्री के कानों में पड़ने वाले ये अंतिम शब्द थे। वह महल, सोना और वह स्वर्ग सब मिट्टी में मिल गए, और रेगिस्तान फिर से अपने तपते हुए रूप में लौट आया। जिन्न ने हँसते हुए उस आदमी की रूह से अपना पेट भरा, और फिर वापस चिराग के भीतर समा गया – अपने अगले मालिक की प्रतीक्षा में।
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