दो अजन्मे जुड़वा शिशु, श्रद्धा और अहंकार, गर्भ के भीतर बातचीत कर रहे थे।
श्रद्धा: “क्या तुम माँ को मानते हो?”
अहंकार: “नहीं।”
श्रद्धा: “मुझे पता है कि तुम्हारे लिए यह स्वीकार करना मुश्किल होगा, लेकिन मेरा मानना है कि माँ है…”
अहंकार: “बेतुकी बातें मत करो! अपने आस-पास देखो, ये दुनिया ही सब कुछ है! तुम माँ को कैसे मान सकते हो? अच्छा बताओ, यदि माँ है, तो वह इस समय कहाँ है?”
श्रद्धा: “मेरा मन कहता है कि माँ हमारे सभी ओर है। हम माँ के भीतर ही जीते हैं। माँ के बिना इस दुनिया का भी अस्तित्व नहीं होता।”
अहंकार: “या हो सकता है कि यह “माँ” केवल तुम्हारी कल्पना की उपज है? इस दुनिया की कठोर वास्तविकता से बचने के लिए तुम्हारे मन द्वारा रची गई एक अवधारणा? क्या तुम्हारे पास माँ की उपस्थिति का कोई तार्किक प्रमाण है?”
श्रद्धा: “हम दोनों जो निरंतर हलचल महसूस करते हैं, वह उसके अस्तित्व का संकेत है। इस दुनिया के सभी दुख और पीड़ाएँ हमें उसकी ओर ले जा रहे हैं। कभी-कभी जब हम मौन होते हैं, तो मैं माँ को सुन पाता हूँ, उसे महसूस कर पाता हूँ।”
कुछ सप्ताह बाद, दोनों जुड़वा शिशुओं के जन्म का समय आ गया। इतना समय अंधकार में बिताने के कारण उनकी आँखें मुश्किल से ही प्रकाश के अनुकूल हो पा रही थीं। जब उन्होंने आखिरकार अपनी आँखें खोलीं, तो खुद को किसी की गोद में पाया। दो चमकती आँखों की सुंदरता को देख उनके मुँह खुले के खुले रह गये। उन आँखों से अथाह प्रेम बरस रहा था। और उस एक धन्य पल में उन दोनों शिशुओं ने एक ऐसे अकथ्य आनंद को जाना जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
*यह कहानी ‘जुड़वा शिशुओं का दृष्टांत’ के नाम से प्रचलित है। इंटरनेट पर इसके कई संस्करण उपलब्ध हैं।
सुंदर संवाद