मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त दुनिया में “स्पाइरलिंग” (spiraling) नाम का रोग सर्दी-ज़ुकाम से भी अधिक सामान्य हो गया है। ‘स्पाइरलिंग’ अर्थात् नकारात्मक विचारों के चक्र में फँस जाना। यह चक्र कोई साधारण सी घटना से भी आरंभ हो सकता है, शायद एक ट्रैफिक सिग्नल, या किसी रिश्तेदार की कोई बात। एक बार जो इस चक्र में गिर गया, उसके लिए बाहर निकलना असंभव सा प्रतीत होता है।
गिरने के लिए किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं होती, वह तो गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में होता है। उसी प्रकार, नकारात्मक विचारों का अधोमुखी चक्र मानसिक गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में होता है। नकारात्मकता की एक बूंद भी हिमस्खलन का रूप ले सकती है।
यहाँ एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है – क्या सकारात्मकता का “ऊर्ध्वमुखी चक्र” भी संभव है? बिल्कुल है, लेकिन गुरुत्वाकर्षण के विपरीत जाकर सकारात्मकता की सीढ़ियों पर चढ़ने के लिए सचेत प्रयास की आवश्यकता होती है। अपनी सजगता की धारा में एक सकारात्मक विचार को लाकर आप इस चक्र का आरंभ कर सकते हैं। किसी ऐसी वस्तु-व्यक्ति-परिस्थिति के बारे में सोचें जिसके लिए आप कृतज्ञता अनुभव करते हैं, अपनी प्रेरणा के स्रोत का स्मरण करें, किसी सुखद स्मृति को चित्त में लाएँ, या किसी दूसरे को खुश करने में मिले संतोष को याद करें। बधाई हो, आपने पहला कदम उठा लिया! अब आगे बढ़ते रहें।
अथवा, आप सीढ़ियाँ छोड़कर लिफ्ट भी ले सकते हैं, इस तथ्य को हृदयस्थ करके कि आप जीवन के स्रोत से अलग नहीं हैं; आप उस एक के ही अभिन्न अंग हैं जिसने संपूर्ण सृष्टि के साथ-साथ आपकी सभी परेशानियों की भी रचना की है। लिफ्ट की प्रतीक्षा करते समय स्वयं को धीरे से याद दिलाएं – “वह कभी भी मुझे मेरी क्षमता से अधिक बोझ नहीं देता है।”
अपना मार्ग स्वयं चुनें: छोटे-छोटे कदम, या श्रद्दा की छलांग। आपका चुनाव चाहे जो भी हो, “ऊर्ध्वमुखी चक्र” सिर्फ एक संभावना नहीं रहती, बल्कि एक निश्चितता बन जाती है जैसी ही आप ऊपर चढ़ने का निर्णय करते हैं; क्योंकि जीवन नकारात्मकता की खाई में जीने के लिए नहीं बना था।
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