कृतज्ञता से मिलता ही क्या है? बस इस साधारण-से संसार की दीवार में एक अलौकिक द्वार?
कृतज्ञता बाहर की दुनिया को नहीं बदलती। समय अब भी अपनी रफ़्तार से चलता है; तनाव अब भी एक बिन बुलाए मेहमान की तरह किसी भी पल दस्तक दे सकता है, और यह दुनिया अब भी अपनी अंतहीन दौड़ में लगी रहती है।
लेकिन जैसे ही इन सब के बीच कृतज्ञता का आगमन होता है, कुछ अदृश्य सा जादू दृश्यमान होने लगता है। पानी के एक ग्लास में अब केवल पानी नहीं दिखता। उसमें वर्षा दिखती है, बादल दिखते हैं, आकाश दिखता है – एक ऐसा प्रसाद दिखता है जो मीलों का सफ़र तय कर आपके हाथों में कुछ पलों के लिए ठहरा है।
एक सामान्य सी श्वास भी केवल एक श्वास नहीं रहती। बिना बताए आती है, बिना किसी शिकायत के चली जाती है, और बीच में जीवन का अनोखा चमत्कार दे जाती है।
कृतज्ञता इस बात को स्मरण करना है, कि यह जीवन हमारे स्वयं का बनाया हुआ नहीं है; कि इस दृश्य जगत के पीछे एक ऐसी सत्ता खड़ी है जिसने सबकुछ थामकर रखा है। कृतज्ञता एक साधारण से पल में भी छिपे ईश्वर की झलक है; एक संकेत है – कि तनाव और चिंताओं से परे, एक अनहद कृपा निरंतर बरस रही है। कृतज्ञता का अनुभव यानी संसार के शोर में भी इस रिमझिम बरसात को सुन लेना।
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