पृथ्वी के वायुमंडल में लगभग 21% ऑक्सीजन है। लेकिन 2.5 अरब साल पहले ऐसा नहीं था, जब वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा ना के बराबर थी। यही वह समय था जब हमारे ग्रह पर सायनोबैक्टीरिया (cyanobacteria) नामक सूक्ष्मजीवों का प्रवेश हुआ। ये पहले ज्ञात जीव हैं जिन्होंने प्रकाश-संश्लेषण (photosynthesis) की प्रक्रिया का उपयोग करके ऑक्सीजन का उत्पादन किया।
आइये एक विचार प्रयोग पर चिंतन करते हैं – मान लें कि आप 2.5 अरब साल पहले इस छोटे से जीव के रूप में अस्तित्व में थे। हो सकता है कि आप कुछ दिनों तक जीवित रहे हों। मृत्यु के समय आपके (काल्पनिक) मन ने शायद सोचा होगा – “इस जीवन का क्या उपयोग था? मैं इतनी ज़रा सी अवधि के लिए जीवित रहा, और अब मृत्यु का समय भी आ गया। इस दुनिया में मेरे कारण कुछ भी तो नहीं बदला!” परंतु आप उस समय यह नहीं जान सकते थे कि उस छोटे से जीवन की हर एक श्वास अरबों साल बाद अनगिनत जीवों के लिए एक अमूल्य उपहार का कार्य करेगी।
जब हम किसी उच्च उद्देश्य के लिए कर्म करते हैं, तो हम भी इसी प्रकार के प्रश्नों में पड़ सकते हैं – “क्या मेरे कर्मों का कोई भी प्रभाव होगा? मेरे छोटे-छोटे कर्म किसी महत्त्वपूर्ण परिणाम में कैसे योगदान दे सकते हैं?” ऐसे समय में, याद रखें कि आपके अधिकांश कर्मों का प्रभाव आपकी वर्तमान समझ के दायरे से परे होता है। और कभी-कभी, आपके जीवनकाल के दायरे से भी परे होता है।
अपना हर कर्म ऐसे करें मानो आप एक छोटा सा माध्यम हैं जिसके निमित्त से कोई अकल्पनीय और भव्य योजना पूरी की जा रही है। यह अहसास ही कर्म योगी बनने की कुंजी है।
और यदि वैसा करना बहुत कठिन लगे, तो सायनोबैक्टीरिया से प्रेरणा लें। बस अपने कर्तव्य कर्म करते रहें।
आहो उपकार, श्री गुरुजी।
अद्भुत अभिव्यक्ति 🙏। जब भी मन में कोई सवाल या निराशा होती है, आपके वचन किसी भी रूप में सामने आ जाते हैं। 🙏🙏
गहन प्रेरणादायक चिंतन!