एक बार की बात है, एक भक्त था जो पूरे हृदय से ईश्वर के प्रति समर्पित था। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर ईश्वर उसे वरदान देने के लिए साकार रूप में उसके सामने प्रकट हुए।
भक्त का हृदय प्रसन्नता से झूम उठा। उसने ईश्वर से हर समय और हर परिस्थिति में उसके साथ चलने की प्रार्थना की। और ईश्वर ने उसकी प्रार्थना सुन ली! अब वह जहाँ भी जाता, उसे अपने साथ-साथ एक और जोड़ी पदचिह्न दिखाई देते, जो उसे सदा स्मरण दिलाते की ईश्वर उसके साथ हैं।
परंतु कुछ महीनों के बाद भक्त पर एक संगीन विपत्ति आयी। उसने एक दुर्घटना में अपने परिवार को खो दिया, और उसकी पूरी दुनिया बिखर गई। एक दिन निराशा में अकेले चलते हुए उसने केवल अपने पदचिह्न देखे। अनाथ महसूस करते हुए वह रो पड़ा, “प्रिय परमात्मा! आपने अपना वचन तोड़कर मेरे सबसे बुरे समय में मुझे अकेला क्यों छोड़ दिया?”
उसे इस तरह की पीड़ा में देखकर ईश्वर प्रकट हुए और उससे कहा – “हाँ, तुम जिस दुःख से गुज़र रहे हो, उसे देखकर मुझे अपना वचन तोड़ना पड़ा। अब मैं तुम्हारे साथ नहीं, तुम्हें अपनी बाहों में लेकर चल रहा हूँ, प्रिय बालक!”
प्रतिकूल परिस्थितियाँ ईश्वर की अनुपस्थिति का प्रमाण नहीं देतीं, बल्कि हमारी श्रद्धा को दृढ़ करने का अवसर होती हैं। उनका उपयोग अपनी श्रद्धा में से संदेह रूपी मलिनता को दूर करने के लिए करें। भले ही हमारी सीमित बुद्धि जीवन में होने वाली घटनाओं की श्रृंखला को समझ न पाए, परंतु यह विश्वास रखें कि सब कुछ उस ईश्वरीय सत्ता की दिव्य योजना के अनुसार ही हो रहा है। जिनमें यह अटूट श्रद्धा होती है, वे निश्चित रूप से हर पल ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करते हैं..!
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