जब आप संसार का हाथ थामकर सुख की राह पर चलते हैं, तो आपका संतुलन आपके नियंत्रण में नहीं रहता। यह ढंग अधिक आसान, सुरक्षित और सुखद लग सकता है, लेकिन हर कदम पर गिरने का भय बना रहता है। और कभी भी इस बात का पूरी तरह से निश्चय नहीं हो सकता कि जिस रास्ते पर आपको ले जाया जा रहा है, उस पर आप चलना चाहते हैं भी या नहीं?
ध्यान अपने पैरों पर चलना सीखने की क्रिया है।
हर पल किसी न किसी क्रिया में डूबे रहने वाली इस दुनिया में, ध्यान वह कला है जिससे हम सबसे महत्वपूर्ण क्रिया में महारत हासिल करते हैं – ‘कुछ नहीं’ करना, और अंततः ‘कुछ नहीं’ हो जाना। स्वाभाविक है कि आरंभ में यह कठिन लगता है, क्योंकि हमें सहारे के लिए व्यक्तियों, वस्तुओं और क्रियाओं के अवलंबन की आदत पड़ गई है। मानो जैसे कोई पहली बार चलने की कोशिश कर रहा हो! प्राचीन काल में, मानव शिशु अपनी माँ का स्थिर हाथ थामकर छोटे-छोटे कदमों से चलना सीखते थे। आज भी, दुनिया भर के शिशुओं के लिए यही एकमात्र सिद्ध उपाय है।
एक ऐसा मार्गदर्शक खोजें जो आपको अपना संतुलन बनाना सिखाए। ध्यान करें। क्योंकि जिसने अपने सुख पर स्वयं नियंत्रण पा लिया, उसने अपने जीवन पर नियंत्रण पा लिया। जिसने ‘कुछ नहीं’ करने में महारत हासिल कर ली, वह अब कुछ भी कर सकता है। और जो ‘कुछ नहीं’ हो गया, वही ‘सर्वस्व’ हो गया।
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