जीवन की एक विचित्र विडंबना यह है कि हम अक्सर वस्तुओं को उनकी अनुपस्थिति में ही पहचानते हैं। भोजन में नमक, घर में बिजली, शरीर का स्वास्थ्य – जब ये सहजता से उपलब्ध होते हैं तब इनकी अहमियत समझना मुश्किल होता है।
ईश्वर की अहमियत समझना भी उतना ही मुश्किल है जब हम उनकी ही बनाई सृष्टि से घिरे हों। जहाँ भी हमारी नज़र जाती है, वो वहीं मौजूद हैं, फिर भी वही सबसे अधिक अनदेखे रह जाते हैं।
मनुष्य के स्वभाव की इस विचित्रता को देखते हुए, ईश्वर ने स्वयं को हमारे हृदय के सबसे गहरे और शांत कक्ष में समेट लिया। इस आशा में कि उनकी अनुपस्थिति हमें उन्हें ‘देखने’ पर मजबूर करेगी, उन्होंने हमें एक असहनीय असंतोष के साथ छोड़ दिया। लेकिन यह पहचानना कि हमने असल में खोया क्या है, भोजन में नमक की कमी भाँपने जितना सरल नहीं था; इसलिए हम उस खालीपन को भरने दर-दर भटकते रहे।
और इसलिए, वो एक मार्गदर्शक के रूप में वापस आए। हमें उस खालीपन के साथ बिठाने और उसकी सघनता को महसूस कराने के लिए।
उपस्थिति अनदेखी रह जाती है।
उपस्थिति अनुपस्थिति को जन्म देती है।
अनुपस्थिति खालीपन में बदल जाती है।
वह खालीपन एक खोज का आरंभ करता है।
और अंततः उपस्थिति ही यह प्रकट कर देती है कि वह खालीपन किसे खोज रहा था।
यही वह दिव्य रहस्य है, विरोधाभास है, जो इस सुंदर यात्रा के हर पल को सार्थक बनाता है।
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