हर वर्ष नवरात्रि का त्योहार उत्सव का अवसर लेकर आता है। पर क्या हमने कभी रुककर पूछा है कि हम आख़िर किस बात का उत्सव मना रहे हैं? देवी के अवतरण में ऐसा क्या है जो वास्तव में उत्सव के योग्य है?
केवल मज़े के लिए मनाया गया उत्सव कुछ पलों का सुख बटोर लेने का एक स्व-केंद्रित प्रयास है। सच्चा उत्सव तो भीतर से उमड़ता वह आनंद है जो तब बहता है जब अपारता की वर्षा में हमारा अस्तित्व ही नाच उठता है! यह वह गरबा है जो पूर्ण स्थिरता में घटता है; कृतज्ञता का एक आंतरिक नृत्य, उस गर्भ के इर्द-गिर्द जो हमारे अस्तित्व के केंद्र में स्थित है और हर पल इतने प्रसाद उत्पन्न कर रहा है कि हमारा हृदय उन्हें कभी पूरी तरह समेट नहीं सकता है।
यही नवरात्रि के नौ दिवसों और रात्रियों का वास्तविक प्रयोजन है — स्वयं को देवी की अनंत वर्षा में भिगो देना। पर यह नृत्य अपने आप आरंभ नहीं होता; इसके लिए ध्यान की यौगिक प्रक्रिया चाहिए। श्री गुरु की प्रत्यक्ष मौजूदगी में इस रविवार का ध्यान धारा साधकों को ऐसे ही एक निर्देशित ध्यान प्रयोग की गहराई में ले जाएगा।
आइए, देवी माँ को उस कृपा के रूप में अनुभव करें जो हर क़दम पर हमें थामे हुए है, अपने आँचल की छाँव में लिए चल रही है!
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