‘दशहरा’ शब्द सुनते ही मन में पहली छवि शायद रावण के जलते पुतले की उभरती है — बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक। लेकिन क्या भारतीय संस्कृति का इतना महान महाकाव्य केवल एक नैतिक शिक्षा देता है?
यदि संसार में अच्छाई है, तो द्वैत के नियम के अनुसार बुराई का अस्तित्व भी निश्चित है। एक रावण जलेगा, तो काल का चक्र दस और रावण खड़े कर देगा।
रावण का सबसे घोर कृत्य था सीता का हरण कर उन्हें श्रीराम से अलग करना, और यही उजागर करता है कि वह वास्तव में कौन है। रावण वह अहंकार है जो हमें प्रियतम से दूर करता है। हाँ, यह सत्य है कि दशहरे के दिन श्रीराम ने रावण को पराजित किया था। लेकिन हम अक्सर भूल जाते हैं कि उसी दिन सीता का वियोग भी समाप्त हुआ था।
और श्रीराम? वे ‘अच्छाई’ के प्रतीक नहीं हैं। वे तो प्रेम के साकार स्वरूप हैं। प्रेम के तरकश से निकला बस एक तीर पर्याप्त है अहंकार को भस्म करके वियोग के इस भ्रम को मिटाने के लिए — एक प्रत्यक्ष सद्गुरु।
सेनाएँ और रणभूमियाँ बदलती रहेंगी, पर अच्छाई और बुराई का संग्राम सदा चलता ही रहेगा। फिर भी इस दिन को ‘विजयादशमी’ भी कहा जाता है। तो कौन-सी विजय? केवल वही, जो इस संग्राम में आपकी भूमिका का अंत कर दे — राम से मिलन।
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