सूर्यास्त के समय एक व्यक्ति उदास भाव में नदी के किनारे बैठा था। थोड़ी देर बाद एक फकीर उसके पास आकर बैठ गए, और पास के पक्षियों को दाने डालने लगे। फकीर के प्रसन्नचित्त व्यवहार को देखकर परेशान व्यक्ति ने झिझकते हुए उनसे पूछा, “आप इतने खुश क्यों हैं?”
फकीर ने उल्टा उस व्यक्ति से पूछा, “तुम इतने उदास क्यों हो?”
निराशा भरे स्वर में उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, “मैं अपनी पत्नी और बच्चों से बहुत प्रेम करता हूँ, लेकिन मुझे उनसे वैसा प्रेम नहीं मिलता। मैं हर दिन काम पर अपना 100 प्रतिशत देता हूँ, लेकिन मेरा बॉस कभी मेरी मेहनत की सराहना नहीं करता। यह दुनिया सिर्फ़ लेना जानती है, कोई भी वापस देने की सोचता ही नहीं!”
फकीर सोच के बोले, “तुम ये दाने लो और पक्षियों को डालो।” फकीर की बात का मान रखने के लिए वह व्यक्ति वैसा करने लगा, और धीरे-धीरे उसने खुद को शांत होते महसूस किया। फकीर ने कहा, “मैं इन्हें हर रोज़ दाने डालता हूँ। ये या तो दाना चुगते हैं और उड़ जाते हैं, या मेरे प्रयास को पूरी तरह से अनदेखा कर देते हैं। लेकिन कभी भी धन्यवाद का एक भी भाव नहीं दिखाते। कितने स्वार्थी हैं!”
वह व्यक्ति हंस के बोला, “ये पक्षी तो सिर्फ स्वतंत्र हैं, स्वार्थी नहीं।”
फकीर ने मुस्कुराते हुए पूछा, “और तुम्हारी पत्नी, बच्चे, बॉस स्वतंत्र नहीं हैं ?”
जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण बोध लेकर वह व्यक्ति घर लौट गया और एक अपूर्व शांति की अनुभूति के साथ सो गया, जबकि फकीर औरों को जगाने वहीं नदी किनारे रुके रहे…
बहुत सही